डॉ. मुक्ता
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अहं या वहम…। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये दुनिया है दो दिन का मेला / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३३३ ☆
☆ अहं या वहम… अत्यंत घातक… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘जल्दी जागना हमेशा फ़ायदेमंद होता है, फिर चाहे वह अपनी नींद से हो; अहं से हो; वहम से हो या सोए हुए ज़मीर से… इनसे जितनी शीघ्रता से मुक्ति पा ली जाए; शरीर व मन के लिए उपयोगी है।’ जितनी शीघ्रता से मानव भोर होते, सूर्योदय से पूर्व नींद से जाग जाए… स्वास्थ्य-प्रदायक है। ‘जो सोवत है, सो खोवत है’ अर्थात् जो जागता है, वही पाता है। सो! समय से पूर्व जागने वाला व्यक्ति सदैव लाभ प्राप्त करता है और देर तक सोने वाले की हानि होना निश्चित है। यह सार्वभौमिक सत्य है कि कुछ पाने के लिए, कुछ खोना अवश्य पड़ता है। हम अगली सांस तब तक ग्रहण नहीं कर सकते, जब तक हम पहली श्वास का त्याग नहीं करते। प्रकृति की सब वस्तुएं हमें मुफ़्त में प्राप्त होती हैं, पर्याप्त हैं–परंतु संग्रहणीय नहीं हैं। यदि हम सीमा में रहते हुए उनका उपयोग करते हैं, तो उनका अभाव कभी नहीं खलता। परंतु जब हम आवश्यकता से अधिक उनका संग्रह करना प्रारंभ कर देते हैं, तो प्रकृति अपना विकराल रूप दिखा कर, मानव को सचेत करती है कि समय रहते चेत जाओ … अपनी बढ़ती लालसाओं पर अंकुश लगाओ … अपने संसाधनों का अतिरिक्त दोहन मत करो, अन्यथा तुम्हें इसका हर्ज़ाना अथवा दुष्परिणाम अवश्य भुगतना पड़ेगा। परंतु मदहोश मानव उसकी ग़ुहार की ओर ध्यान नहीं देता, बल्कि उपेक्षा भाव दर्शाता है–तो प्रकृति भीषण आपदाओं के रूप में अपना रोष प्रकट करती है।
हरी-भरी धरा को कंक्रीट के जंगल बनाने के कारण तापमान निरंतर बढ़ रहा है; ग्लेशियर पिघल रहे हैं; सुनामी दस्तक दे रहा है; ज्वालामुखी पर्वत फटने से भूकंप आ रहे हैं; सुनामी दस्तक दे रहे हैं; धरती फट रही है और मानव का सर्वस्व सैलाब में बह रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि प्रकृति अपनी असीम वेदना व अथाह दु:ख प्रकट करते हुए आंसू बहा रही है। परंतु फिर भी मानव प्रकृति से खिलवाड़ कर रहा है; अपनी सीमाओं का उल्लंघन कर प्रतिबंधित क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहा है और उसके आक्रोश को समझने की ज़ेहमत नहीं पा रहा, क्योंकि वह चिरनिद्रा में सो रहा है।
अहम् और वहम एक सिक्के के दो पहलू हैं, जिनका चोली-दामन का साथ है। अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है, जो इस वहम में जीता है कि उससे अधिक बुद्धिमान, समझदार व शक्तिशाली कोई दूसरा हो ही नहीं सकता है। सो! वह पूरी सृष्टि पर अधिपत्य स्थापित कर, अपने अहम् की पुष्टि करना चाहता है। वह अहंनिष्ठ प्राणी केवल अपने बारे में चिंतित रहता है; अपनी सुख-समृद्धि के निमित्त प्रयासरत रहता है तथा दूसरों पर विजय प्राप्त करने के बारे में सोच- विचार कर योजनाएं ही नहीं बनाता, बल्कि उसके कार्य-क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की अनाधिकार चेष्टा भी करता है। सो! वह राह में आने वाले प्रत्येक वस्तु व व्यक्ति को मिटा डालना चाहता है; भले ही उसे कितने ही निम्नतम स्तर पर ही क्यों न उतरना पड़े? वह किसी अन्य को समान स्तर पर देख आत्म- नियंत्रण खो बैठता है; अपने आपे से बाहर हो जाता है… मानव-मूल्यों को तज, उचित-अनुचित को नकार सभी सीमाओं को लांघ जाता है। इस स्थिति में मर्यादा भी उसकी राह का रोड़ा नहीं बनती, क्योंकि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है … भले ही वह उसका वहम क्यों न हो? लाख प्रयास करने पर भी वह दम्भी मनुष्य उस स्वनिर्मित चक्रव्यूह से बाहर निकलना ही नहीं चाहता। सो! ऐसे अहंनिष्ठ व्यक्ति का व्यवहार सामान्य कैसे रह सकता है और वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ कैसे सुन सकता है? उसके लिए अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य कोई मायने नहीं रखता। वह बॉस की भांति केवल स्वयं को सदैव ठीक मानता है… अपनी सोच को उचित ठहराता है, क्योंकि ग़लती तो वह कभी कर ही नहीं सकता। ऐसे व्यक्ति को यदि आप हिटलर की संज्ञा भी देंगे, तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।
काश! मानव सोच पाता कि संसार में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। संसार रूपी रंगमंच पर सबको अपना क़िरदार अदा कर, ज़िदगी के सफ़र पर चल देना है। कोई भी व्यक्ति इस संसार में सदैव नहीं रहा तथा मृत्यु समय आने पर उसे लाख परदों के पीछे से भी ढूंढ लेती है। सो! मानव को अपना अहं त्याग कर, सबको समान दृष्टि से देखना चाहिए; उनसे अच्छा व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि जैसा व्यवहार आप दूसरों के साथ करते हैं, वही प्रतिध्वनि के रूप में लौट कर आपके पास आता है।
‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’ अथवा ‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाए’ अर्थात् जैसे कर्म करोगे, वैसा ही फल आपको प्राप्त होगा। इसलिए जो व्यक्ति आप का अहित चाहता है; आपके पथ में कांटे बिछा कर अवरोध उत्पन्न करता है; उस स्थिति में आपके लिए वैसा ही प्रत्युत्तर न देना बेहतर है,
अर्थात् अपना रास्ता बदल लेना अधिक कारग़र है, क्योंकि मानव को अपने कृत-कर्मों के अनुसार फल अवश्य मिलता है। यदि कोई आपके साथ बुरा भी करता है, तो भी आपको उसके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए…यही जीने का सबसे सर्वश्रेष्ठ व उत्तमोत्तम मार्ग है। परंतु कुछ परिस्थितियां अपवाद भी हो सकती हैं।
वहम सब रोगों की जड़ है। वहम केवल एक आदत नहीं… स्वयं को, अपनी सोच को ठीक व उचित समझने का मात्र जज़्बा नहीं है। यह भ्रम की वह स्थिति है, जिसमें अवगाहन कर मानव अपने सम्मुख सबको हेय समझता है तथा उनके अस्तित्व को नकार देता है। वह लाज-मर्यादा तज, जीवन-मूल्यों का तिरस्कार कर, सब पर दोषारोपण कर सुक़ून पाता है तथा सबको एक ही लाठी से हांकने में विश्वास रखता है। उसका सुप्त अहं व मृत्त ज़मीर उसके सोचने-समझने की शक्ति का हरण कर लेता है। इस स्थिति में सब उससे घृणा करने लग जाते हैं; कोई भी उससे बात तक करना पसंद नहीं करना चाहता। परंतु एक लंबे अंतराल के पश्चात् जब उसकी शारीरिक शक्तियां क्षीण हो जाती है; मनो- मस्तिष्क साथ नहीं देता… एकांत की त्रासदी झेलता वह अहंनिष्ठ शख़्स अपनों के बीच; अपनों के साथ जीवन का आखिरी समय व्यतीत करना चाहता है, परंतु उसके हाथ केवल निराशा ही लगती है। इन परिस्थितियों में वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है…पागलों जैसा असामान्य व्यवहार करने लगता है और प्रायश्चित-स्वरूप उन्हें जीवन के समस्त सुख प्रदान कर, अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहता है…अपने सुख-दु:ख साझे करना तथा अपनी विवशता व अप्रत्याशित परिस्थितियों से अवगत कराना; उसकी प्राथमिकता बन जाती है… परंतु सब निष्फल। उसके आत्मज उस स्थिति में उसे अतिव्यस्त, आत्मनिष्ठ, आत्ममुग्ध व आत्मलीन भासते हैं… जिसका अंजाम उसे नियति के अनुसार अपने कर्मों के अनुरूप अवश्य भुगतना पड़ता है।
काश! मानव का ज़मीर ज़िंदा रहता… संवेदनाएं मृत्त नहीं होतीं… संबंधों की गरिमा बनी रहती… रिश्तों की अहमियत बरक़रार रहती..जीवन-मूल्य प्रासंगिक रहते, तो मानव संवेदनहीनता के दायरे में प्रवेश करके दुष्कर्म, फ़िरौती, कन्या भ्रूण-हत्या आदि के हादसों को अंजाम न देता; बालिकाओं की अस्मत सुरक्षित रहती; मां, बहन, बेटी को मात्र उपयोगिता की वस्तु न समझा-स्वीकारा जाता, लूट-खसोट, फ़िरौती, दुष्कर्म व हत्या की घटनाएं आम नहीं होतीं और उन पर अंकुश लग पाता। परंतु यह तभी संभव हो सकता था; यदि हमारा ज़मीर ज़िंदा होता।
आइए! लौट चलें ,अपनी संस्कृति की ओर… जहां ज्ञान-रूपी सूर्योदय सबसे पहले होता था। जहां सांस्कृतिक एकता के रूप में, विविधता में एकता विद्यमान थी। सभी धर्म-जातियों के लोग मिल-जुल कर रहते थे। पारस्परिक स्नेह-सौहार्द व मर-मिटने का भाव था, सब मर्यादा की सीमा-रेखा का स्वेच्छा से पालन करते थे और अधिकारों के स्थान पर कर्तव्यनिष्ठता व्याप्त थी। सब परमात्म-सत्ता के सम्मुख नत रहते थे…इसलिए असामान्य व अमानवीय हादसे घटित नहीं होते थे और समाज में समन्वय व सामंजस्यता व्याप्त रहती थी।
इए! हम लौट चलें! अपने स्वर्णिम अतीत की ओर.. जहां सुक़ून था, शांति थी, सुख का साम्राज्य था। मानव राग-द्वेष व स्व-पर से ऊपर था; वहां नकारात्मकता का लेशमात्र भी स्थान नहीं था तथा सर्वहिताय व सर्वमंगल की भावनाएं जन-मानस में निहित थीं। सो! हमें अहं का त्याग कर, वहम से मुक्ति प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि प्राणी-मात्र में परमात्म-सत्ता उसी प्रकार व्याप्त है, जैसे सूर्य आकाश में दिखाई पड़ता है और वह विभिन्न घड़ो के जल में भी समान रूप में प्रति- भासित होता है। इसलिए हमें सम्पूर्ण जीव-जगत् में उस ब्रह्म की सत्ता को अनुभव करना चाहिए, ताकि ऐसे सुदृढ़ समाज की संरचना हो सके; जहां सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् का साम्राज्य हो।
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© डा. मुक्ता
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