श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “स्वतंत्रता”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७३ ☆
🌻लघु कथा🌻 स्वतंत्रता 🌻
आज 15 अगस्त तिरंगे झंडे की टोकरी लिए बैठी सड़क पर स्वतंत्रता दिवस की भोर देख रही थी। अभी कुछ झंडे और छोटे – छोटे बैच बिकने को बाकी रह गया था। सोच रही थी अब तो लगभग सभी भीड़ खत्म होने चली है।
मेरी टोकरी में यह बच गया नही बिक पाया। तभी एक नौजवान दौड़ता भागता आया, पूरा सामान उठा कई गुना ज्यादा राशि देकर चलता बना।
वह खुश होकर टोकरी उठा, मुखड़े पर मुस्कान और सरपट चल दी घर की ओर।
दरवाजे पर पहुची ही थी कि झपट्टा मार टोकरी को फेंकते उसका पतिदेव पैसे झींनते हुए
—मना आई स्वतंत्रता दिवस
अब देख गुलामी क्या है। इससे तू आजाद नही हो सकती।
धम्म से धरा पर बैठते सिसक पड़ी – – क्या स्वतंत्र होना इतना निर्मोही होता है। अश्रुं धारा बह चली तुझे तो उम्र भर की गुलामी मिली है जो सदैव जीवन्त रहेगी।
शायद शहीद होने के बाद ही स्वतंत्र हो सकूंगी.
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





