डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय बोधकथा ‘लकीर। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६३ ☆

☆ बोधकथा – लकीर ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

स्वाभिमान और अहंकार की गाड़ी ट्रैफिक में अटक गई। अहंकार ड्राइविंग सीट पर बैठा था। एफ.एम. पर गाने चल रहे थे – ‘दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई- –‘ गाने को सुनकर बातों ने नया मोड़ ले लिया। स्वाभिमान बोला– “तरह-तरह के लोग होते हैं दुनिया में। तू अपने को ही देख, कितना बढ़-चढ़कर बोलता है।” 

अहंकार बोला – “अरे! दुनिया गाल बजानेवालों की है, मुँह सिले बैठे रहो, कौन पूछेगा तुम्हें?” 

“मैं तेरी तरह डींगे नहीं हाँकता। तेरी बातों से दूसरों का दिल दुखता है। मैं जो करता हूँ, अपने मान- सम्मान की रक्षा के लिए” — स्वाभिमान जरा तनकर बोला।

“मैं भी यही करता हूँ। किसी का दिल दुखे, बुरा लगे तो इसमें मेरा क्या दोष? मैं कुएँ के मेंढ़क की तरह नहीं रह सकता।” 

पास खड़ा स्कूटर सवार अभिमान इनकी बातचीत सुन बोला-  “ड्राइविंग सीट पर बैठा अहंकार तो सबको दिखता है पर पिछली सीट पर बैठा स्वाभिमान कब अहंकार में बदल जाता है, इसका भान उसे भी नहीं होता—-!!” 

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
रश्मि लहर
0

सटीक अभिव्यक्ति! बेहद महत्वपूर्ण सृजन!