डॉ. मुक्ता
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा सन्नाटा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३७ ☆
☆ लघुकथा – सन्नाटा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
अब हमें यहां से चले जाना चाहिए। अपना घर अपना ही होता है। किस चीज़ की कमी है हमें? कम से कम हम उनके जीवन में बाधक तो नहीं बनेंगे? कहीं कल विषम परिस्थितियां उत्पन्न होने के कारण एक-दूसरे से संवाद की स्थिति भी न बनी रहे और ताल्लुक़ बोझ बन जाएं; उस स्थान को छोड़ना ही बेहतर व श्रेयस्कर होता है।
– परंतु हम अकेले कैसे गुज़र-बसर करेंगे?
– जिनका कोई नहीं होता, वे भी जीवन जीते हैं।
– ऐसा मत कहो– बच्चे हैं, संभल जाएंगे। आज गुस्से में ग़ुबार निकाल लिया, अब शांत हो जाएंगे। तूफ़ान आने के पश्चात् व्याप जाती है…शांंति, अंतहीन मौन व सन्नाटा। चलो! भुला देते हैं यह सब… बचपन में ही तो बच्चे ग़लतियां करते थे और हम उनकी भूलों को सहज भाव से स्वीकारते थे। फिर आज ऐसा कठोर निर्णय क्यों?
इतना सुनते ही वे अलौकिक-असीम शांति में प्रवेश कर गए और घर में मातम-सा पसर गया।
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© डा. मुक्ता
माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी
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