श्री अरुण कुमार दुबे
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “आदमी ख़ुद को बताते जो ख़ुदा…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # ११८ ☆
आदमी ख़ुद को बताते जो ख़ुदा… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
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हम हक़ीक़त से कहानी हो गए
सारे वादे बे-मआनी हो गए
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अश्क़ दरिया की रवानी हो गए
दर्दे दिल की तर्जुमानी हो गए
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ये सियासत का करिश्मा देखिये
गंगू तेली चुन अदानी हो गए
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कर रहा तक़रीर वो ईमान पर
मूर्तिवत जो बेइमानी हो गए
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मुझसे कतराते रहे जब भी मिले
दिल की धड़कन नागहानी हो गए
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मान लेता हूँ कि मेरी हर ख़ता
आप कैसे पानी पानी हो गए
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आदमी ख़ुद को बताते जो ख़ुदा
वक़्त पर वो सारे फ़ानी हो गए
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याद वर्षों बाद जब उसने किया
हम खिज़ां में जाफ़रानी हो गए
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इब्तिदा-ए -इश्क़ में ये सोचते
ज़र दिखी तो खानदानी हो गए
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पल गए चूजे तो भूले घोसला
छोड़ हमको आसमानी हो गए
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जन्म को माँगी थी जन्नत सी ज़मीं
शुक्रे रब हिन्दोस्तानी हो गए
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ज़िन्दगी कर बंद अपने इम्तहाँ
हम सुदामा की कहानी हो गए
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बन गया हिस्सा जो मेरी ज़ीस्त का
आप वो आदत पुरानी हो गए
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संगदिल जिनकी रही पहचान थी
इश्क़ करते आज पानी हो गए
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ज़ख्म देने का कभी तुमसे गिला
इश्क़ की अब ये निशानी हो गए
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उनकी दी तालीम है ये बस अरुण
हम बुज़ुर्गों की न सानी हो गए
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© श्री अरुण कुमार दुबे
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