श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४४ ☆
☆ लघुकथा ☆ ~ एक चित्र ऐसा भी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
जरा सोचिए! अगर शब्दों में आग हो और भावना में राग हो, तो ऐसा व्यक्तित्व तो अनूठा ही होगा! एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कलम ने संवेदना को नया स्वर दिया और संघर्ष को उद्घोष के अक्षय शब्द| ऐसे हैं बहु आयामी प्रतिभा के धनी राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ – यथा नाम: तथा गुण! अपने गांव की मिट्टी से लेकर साहित्य की दुनिया में जो पहचान बनाई, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। कभी-कभी शब्द उनके आँसुओं जैसे बहे… तो कभी तीर बनकर समाज को झकझोर गए। कहते हैं, उन्होंने मात्र लिखा ही नहीं अपितु यथार्थ ज़िंदगी को काग़ज़ पर जिया भी है। हर रचना में उनकी आत्मा बोलती है, और हर पंक्ति में एक नया प्रश्न उभरता है — क्या शब्द सच में दुनिया बदल सकते हैं? हाँ क्यों नहीं? आइए, जानते हैं ऐसे विलक्षण साहित्यकार – राजेश कुमार सिंह श्रेयस की जीवंत कहानी, जिसने सिद्ध कर दिया — कलम अगर ईमानदार हो, तो वह इतिहास भी लिख देती है!
साभार – युग संवाद (यूट्यूब)
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मेरे जेहन में आज एक कहानी आ रही है। इस कहानी को मैं अक्षरश: कहना चाह रहा था , लेकिन इस कहानी को अक्षरश: कहने में स्वयं को विवश पा रहा हूँ। चलिए कहानी को कुछ आगे बढ़ा कर बताते हैं।
एक चित्रकार था उसको एक चित्र बनाने को कहा गया। जब वह चित्रकार चित्र बनाने बैठा तो उस चित्रकार की विबशता यह हुई कि चित्र बनाने के पहले ही उसके पास ढेर सारे सुझाव आने लगे। पुरानी कहानी में चित्र बनने के बाद सुझाव आये थे, लेकिन इस कहानी में तो चित्र बनने के पहले ही सुझाव आने लगे थे। यह सुझाव, खाली सुझाव नहीं थे। लोग सुझाव के साथ साथ अपने अपने रंग भी भेज रहे थे। किसी ने लाल पीला हरा, किसी ने हरा नीला लाल, किसी ने लाल सफेद काला, नाना प्रकार के रंग भेज दिये। शुरू में चित्र रंगीन हुआ। बाद में रंग इतने हो गए कि चित्रकार के ऊपर ही रंग छिटक छिटक कर पढ़ने लगा। चित्रकार को लग गया कि अब इन्हीं रंगों से सुन्दर दिखने वाला चित्र ही बदरंग होने वाला है। लेकिन चित्रकार की मजबूरी यह थी कि सुझावो के साथ भेजे रंगों को भरना ही भरना था।
चित्रकार पर दबाव बढ़ता गया, और अधिक बढ़ता गया। अब उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इसमें क्या रंग डालूं और कौन सा रंग निकालूं। चित्रकार ने अपने चित्रकला के नीचे अपना छोटा सा नाम हस्ताक्षर स्वरूप लिखा था। लेकिन ऊपर का फरमान यह आया कि सुझाव देने वालों की भी नाम भी उसके रंग के साथ लिखना है। अब चित्रकार परेशान हुआ कि सबके भेजे गए रंगों को भरूं कि सबका नाम लिखूं। उसको तो एक खूबसूरत पेंटिंग बनानी थी। यहां तो पूरे पेंटिंग की किताब का मटेरियल आ गया। अब वह परेशान हो गया कि उसे पेंटिंग बनानी है की पूरी पेंटिंग की किताब बनानी है। खैर फरमान तो फरमान ही होता है और कहा भी गया है कि प्रभुता संपन्न व्यक्ति गलती नहीं करता है। राजा कभी गलती करता ही नहीं है। अब फरमान आया है तो फरमान को पूरा करना ही था।
सभी रंग भरे जाने लगे। रंगों को भेजने वालों के नाम भरे जाने लगे। पूरी पेंटिंग रंगीन हो उठी रंग पर रंग, रंग पर रंग। पेंटिक घना होता गया.. घना होता गया.. घना होता गया , घना होते होते पेंटिंग रंग डिब्बे का पूरा बॉक्स बन गया . अंततः चित्रकार की ब्रश ऐसी मजबूरी में फंसी कि सुझाव देने वालों के रंग और उनके नाम डालते डालते मूल चित्रकार का नाम ही है गायब गया। चित्रकार ने इतने पर भी संतोष किया। उसने यह सोचकर संतोष किया कि चलो अगर चित्र बढ़िया बन गया, तो लोग कहेंगे कि वाह क्या सुंदर सा चित्र बना है। भाई..कमाल का चित्रकार है। गजब का चित्र बनाया है। अब उस चित्र पर उसका नाम न लिखा होने के बाद भी वह अपनी प्रशंसा को सुनकर वह खुश होगा। यह सोचकर, उसने चित्र बनाना जारी रखा।
आखिरकार उसने एक भारी भरकम चित्र बना ही गया। जब चित्र बन गया और वह प्रदर्शित हुआ तो जितने लोगों ने ढेर सारे रंग भरे थे। अपने ही भेजें रंगों को देखकर, लोगों ने उनका नुक्स निकालना शुरू किया। अरे यार, यह छूट गया, यह भरना था,यह नहीं भरना था, यह रंग गया, यह नहीं रखता था। लेकिन सारे सुझाव भेजने वाले भूल गए कि चित्रकार की जगह नाम तो उन्हीं का लिखा है, जिन्होंने खाली सुझाव नही भेजे, बल्कि सुझावों के साथ अपने अपने रंग भी भेजें थे। और अपने ही रंग से पेंटीन को बर्बाद किया, तो चित्रकार का कहां दोषी हुआ।
उसकी चित्रकारिता का हुनर तो वहीं समाप्त हो गया जहां सुझाव देने वालों की संख्या थोड़ी नहीं एक भीड़ के सरीखे आ गई।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






