श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६२ ☆
☆ आलेख ☆ ~ पाँच श्रेष्ठ रचनाकारों की पांच पुस्तकें ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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आज मेरे पांच श्रेष्ठ रचनाकारों की पांच पुस्तकें है। इनमें श्री रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी, मुंशी प्रेमचंद की कर्मभूमि’, जयशंकर प्रसाद का ‘कंकाल’, रामदेव धुरंधर का पथरीला सोना एवं विनोद कुमार शुक्ला की ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी है।
एक पाठक के रूप में मैं जब मैंने इन चारों साहित्यकारों की इन पुस्तकों के कुछ अंशों को पढ़कर उनकी लेखन शैली, भाव प्रवर्षण पर एक तुलनात्मक दृष्टि डालने की कोशिश किया तो मेरे पाठक मन में जो चित्र अंकित हुए, वे कुछ निम्नवत थे ।
रामधारी सिंह ‘दिनकर‘ की रश्मिरथी तृतीय सर्ग से
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” हो गया पूरा अज्ञातवास, पाण्डव लौटे वन में सहास,
पावन में कनक सदृश्य तप कर, विरत्व लिए कुछ और प्रखर,
नस-नस में तेज प्रवाह लिए, कुछ और नया उत्साह लिए।”
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” सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है,
सुरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं, काटों मे राह बनाते हैं।”
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विशेष: राष्ट्रकवि की राष्ट्र भावना और भारतीय शौर्य उनकी लेखनी से, बारंबार उमड़ता है। विरत्व का प्रवाह काव्य की पंक्तियों में, योद्धा यह शौर्य का वंदन करता है। विषम परिस्थितियों में भारतीय जन मानस कैसे मार्ग प्रशांत करता है राष्ट्रकवि की कविताएं बोल पड़ती हैं।
मुंशी प्रेमचंद की कर्मभूमि से (भाग – ३ खंड- २)
“अमरकांत का पत्र लिए हुए नैना अंदर आई, तो सुखदा ने पूछा -किसका पत्र है?
नैना ने खत पाते ही पढ़ डाला था।बोली- भैया का।
सुखदा ने पूछा -अच्छा उनका खत है ? कहां हैं?
‘हरिद्वार के पास किसी गांव में है।’
आज पाँच महीना से दोनों में अमरकांत के कभी चर्चा नहीं हुई थी मानो वह कोई घाव था, जिसको छूते ही दोनों के ही दिल काँपते थे ।
विशेष – संवाद ऐसे मनमोहन, मानो आंखों के सामने सब कुछ चल रहा हूँ। शैली ऐसी की कोई भी समझ ले। यही तो मुंशी प्रेमचंद का कथा लिखने का शिल्प है ।
जयशंकर प्रसाद की कृति कंकाल -७ से
किशोरी और उसकी सहेलियां स्नान करके लौट आई अब यमुना अपनी धोती लेकर बजरे से उतरी और बालू की एक ऊंची टेकरी के कोने में चली गई।
यह कौन ए काम था यमुना गंगा के जाल में पर डालकर कुछ देर तक चुपचाप बैठी हुई विस्तृत जलधारा के ऊपर सूर्य की उज्जवल करने का प्रतिबिंब देखने लगी जैसे रात के तारों की फूल -अंजलि जाह्नवी के शीतल वृक्ष पर किसी ने बिखेर दी हो ।
विशेष: सब कुछ विशेष ही विशेष संवाद मधुर । कथानक प्राकृतिक दृश्यों की सुंदरता को लेखक की कलम से निकलकर अपने ऊपर बिखरते हुए देखत है, शब्द पुष्प लगातार मुस्कुराते है। यह है श्री जयशंकर प्रसाद का लेखन शिल्प।
रामदेव धुरंधर की कृति पथरीला सोना से
भारतीय तीर तलवार के साथ ना जाकर अपनी सांस्कृतिक धरोहर के साथ जाते थे और वहां रहते स्वयं साधु जीवन में ढल जाते थे भारतीय धरती ने कैसे इस तरह से संस्कार स्वयं में पल्लवित उपस्थित किए हो और लगे हाथ लोगों में इस तरह की प्रेरणा का संचार किया हो “मुट्ठी भर लेकर दूसरे देश जाओ जहाँ इसे ऐसे रोप दो कि उगे तो स्वयं भारत उगे”.
तब तो हिमालय ऐसे ही खेल-खेल में वयोवृद्ध नहीं हुआ। गंगा ऐसे ही जननियों की महाजननी मनहीं हुई। इसके पीछे स्वर्ण अक्षरों में अंकित विराट अतीत है। हिमालय ने अपनी अटलता से संदेश दिया जहां रहो अपनी पहचान से रहो और गंगा ने बह कर कहा,सतत गतिशील बने रहने की शर्त रखो।
विशेष: भारतीय संस्कृति को सात समुंदर पार की धरती मॉरीशस से जोड़ता पथरीला सोना के कथानक का यह अंश देखिए न कैसे सब कुछ कह देता है। लेखक के दिल में भारत बसता है, यह मैं नहीं कह रहा उनकी कलम कहती है। यह है श्री रामदेव धुरंधर के लेखन शैली का शिल्प।
विनोद कुमार शुक्ल की कृति दीवार में एक खिड़की रहती थी से
खिड़की की चौखट पर एक साँवली लड़की खड़ी थी। वह दोनों हाथों में चौखट पकड़े हुए खड़ी थी। वह तैयार होकर आई थी। चौखट पर उसके दोनों हाथों की एक-एक छोटी उंगलियों में नेल पॉलिश लगी हुई थी। सोनसी उसके पास आई।
“अंदर आओगी?”
“नहीं।उसने शरमाकर कहा।
“अच्छा रुकना । सोनसी ने कहा।
विशेष: हिंदी लेखक विनोद कुमार शुक्ल के लिखे उपरोक्त पुस्तक के कथानक के इस अंश में पात्रों का संवाद एवं लेखक द्वारा शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत दृश्य आपस में मिलकर कथानक को जीवंत करते हुए प्रतीत होते हैं। लेखक के भाव और लेखन शैली दोनों में ही जीवंतता है।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
३१ जुलाई २०२६
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈












