श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अरे बाबा शोर नहीं, सोर, सोर…“।)
अभी अभी # १०१२ ⇒ आलेख – अरे बाबा शोर नहीं, सोर, सोर
श्री प्रदीप शर्मा
भाषा में शुद्धता का शोर कोई नया नहीं है। उर्दू कोई भाषा नहीं, लेकिन अरबी फ़ारसी कौन जानता है। हम कहां ग्रीक और लेटिन जानते हैं, लेकिन फिर भी अंग्रेजी तो झाड़ ही लेते हैं। आज भी हमारे देश के ग्रामीण इलाकों में रामायण का सस्वर पाठ जिस शुद्धता, उत्साह और मधुरता से किया जाता है, आज की शहर की पढ़ी लिखी पीढ़ी में वह कम ही देखने को मिलता है।
तुलसीकृत रामचरितमानस शुद्ध हिंदी में नहीं, अवधी भाषा में लिखी गई है। मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो। निरगुन कौन देस को बासी ? मीरा बाई के पद भी देख लीजिए ! हे री, मैं तो प्रेम दिवाणी, मोरा दरद ना जाने कोय। कहीं बृज भाषा है तो कहीं कबीर की साखी। भक्ति काल आज भी हमारी हिंदी के लिए बैसाखी का काम कर रहा है। आप तुलसी और राम को अलग नहीं कर सकते। मीरा और सूर को श्याम से दूर नहीं किया जा सकता। सूर, सूर तुलसी शशि के आगे पंत, प्रसाद, निराला, महादेवी, दिनकर और अज्ञेय ही नहीं, आज बहुत कुछ है।।
आज ऐसी हिंदी कौन बोलता है। भाषा और संस्कृति को आप अलग नहीं कर सकते। भक्ति काल को हिंदी का स्वर्ण काल कहा गया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट और
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हमें हिंदी और हिंदी के इतिहास से परिचय कराया। इंशा अल्ला खान द्वारा १८०३ ईस्वी में रचित रानी केतकी की कहानी संभवतः हिन्दी की पहली खड़ी बोली की कहानी है।
गंगोत्री की तरह भाषा का भी उद्गम और विकास होता है। वह देश के कई प्रांतों से बहकर देश की संस्कृति और बोली को एकाकार करती है। कहते रहें कहने वाले, राम तेरी गंगा मैली हो गई, हम तो गंगा में ही स्नान कर पुण्य कमाएंगे। हमारी हिंदी और हमारा व्याकरण एक होने के बावजूद बोली का फर्क तो पड़ेगा ही। होगा भाषा को भासा बोलना असुद्ध, लेकिन हम क्या करें, अगर हमसे शुद्ध ही नही बोला जाता। लोग हम पर बिस्वास नहीं करते, जब हम कहते हैं, हमसे विश्वास नहीं बोला जाता।।
आपने अटल जी को तो सुना है। हर भारतीय को उन पर गर्व है। उन्होंने विदेशों में भी हमारी हिंदी का मान बढ़ाया और देश में भी। क्या धाराप्रवाह ओजस्वी भाषण और झरने सी बहती कविता। वे भी स्कूल को इस्कूल ही बोलते थे। कर लो, जो करना हो। हमारी बोली और भाषा पर हमारे प्रांत का भी असर पड़ता है। है वही हिंदी, लेकिन लहजा और उच्चारण अलग हो सकता है।
भाषा में शुद्धता के साथ अगर रस्टिक टच (देहाती स्पर्श) हो तो वह कर्णप्रिय और मधुर लगती है। रेणु के मैला आंचल और परती परी कथा में यह स्पष्ट दिखाई देता हैं। आंचलिक साहित्य की यही तो विशेषता है। जो बहाव पद्य में है, अगर वही प्रवाह गद्य में हो, तो कंकर कांकर, अक्षर आखर और शक्कर साखर भी हो सकती है। उच्चारण दोष कहीं कहीं इतना सहज होता है कि हम उसके अभ्यस्त हो जाते हैं। अगर आप हिंदी प्रेमी हैं तो उदार बनें। अगर पवन सोर करता है तो करने दें। हमारे शहर के डीजे से वह लाख गुना बेहतर है। सुक्ला जी और मिसरा जी को हमारा परनाम।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





