श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुरु बिन कौन करे भव पारा…“।)
अभी अभी # १०५९ ⇒ आलेख – गुरु बिन कौन करे भव पारा
श्री प्रदीप शर्मा
हम शिक्षक-दिवस मनाते हैं, मातृ-दिवस और पितृ-दिवस भी मनाते हैं। शिक्षक और माता-पिता को गुरु भी माना गया है, और ईश्वर-तुल्य भी ! त्वमेव माता…
वहीं दूसरी ओर गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही नहीं, साक्षात ब्रह्म भी माना गया है। ऐसे सद्गुरु के दिवस को गुरु-पूर्णिमा के पर्व के रूप में श्रद्धा-पूर्वक मनाया जाता है।
माता-पिता और शिक्षा-गुरु के सत्संस्कार-स्वरूप व्यक्ति में बचपन से ही श्रद्धा, आदर और आस्था के बीज पल्लवित होने लगते हैं, जो उम्र के साथ विकसित हो, स्वभाव में विनम्रता और निष्ठा का रूप ले लेते हैं।
यह सब एक सत-शिष्य की पृष्ठभूमि ही है।।
जो चित्त में व्याप्त अंधकार को मिटाए, और ज्ञान का प्रकाश फैलाए, वह सतगुरु। गुरु कोई शरीर नहीं, एक अवस्था है, जहाँ सिर्फ़ जगत के कल्याण के भाव का संकल्प ही निहित होता है।
जब शिष्य पर गुरु की अहैतुकी कृपा होती है, तब वह दीक्षा कहलाती है।
जहाँ स्वार्थ का अभाव है, सांसारिकता और भौतिक उपलब्धि की आकांक्षा नहीं, केवल आत्म-कल्याण का भाव जीव में उत्पन्न होता है, तब सतगुरु का संकल्प कृपा के रूप में प्रकट होता है। एक नरेंद्र और एक रामकृष्ण-परमहंस का गुरु-शिष्य के रूप में मिलन होता है।।
गुरु अथवा ईश्वर में तब तक ही अंतर नहीं है, जब तक उन्हें व्यापक अर्थ में न लिया जाए।
ईश्वर कोई शरीर नहीं, गुरु कोई शरीर नहीं ! गुरु-तत्व और ईश्वर-तत्व एक है। गुरु के शरीर को ईश्वर मानने वाले, अध्यात्म मार्ग पर नहीं, आसक्ति-मार्ग पर अग्रसर होने लगते हैं। सतगुरु का मार्ग निष्काम कर्म, श्रद्धा, समर्पण और मोक्ष का मार्ग है। जो गुरु आपको संसार से भगाए, वह सतगुरु नहीं ! जो आपके मन के सांसारिक प्रपंच से मुक्ति दिलाए, वही सद्गुरु।
सबके चित्त में आसीन उस गुरु-तत्व को प्रणाम। गुरु-पूर्णिमा की बधाई।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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