श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मौसा जी और फूफा जी।)

?अभी अभी # १०६६ ⇒ आलेख – मौसा जी और फूफा जी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

रिश्ते में हम आपके फूफा लगते हैं ! मैं नहीं जानता ये बेचारे मौसा जी और फूफा जी इतने बदनाम क्यों है। हर बारात में ये प्राणी किसी असंतुष्ट व्यक्ति की तरह व्यवहार क्यूं करते हैं। कहा गया है न, बद अच्छा, बदनाम बुरा। मैने अच्छे मौसा और उनसे भी अच्छे फूफा देखे हैं, लेकिन कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। छोड़ो बेकार की बातें, तुम रूठ ना जाओ बहना।

मैं आज तक यह समझ नहीं पाया, रिश्ते बन जाते हैं, अथवा बनाए जाते हैं।

बात आपके पैदा होने से शुरू होती है। आप पैदा होते हैं, अथवा पैदा किए जाते हैं। मुझे संस्कृत नहीं आती, इसलिए मैं किसी के चरित्र अथवा भाग्य पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता, लेकिन मुझे लगता है, यह पुरुषार्थ और भाग्य का मिला जुला खेल है।।

आप अगर एक बार पैदा हो गए, तो पैकेज में माता पिता के साथ कुछ रिश्ते तो ईश्वर छप्पर फाड़कर दे ही देता है और कुछ रिश्ते आप अपने पुरुषार्थ और भाग्य के बल पर बना ही लेते हैं। भाई बहन, नाना नानी, दादा दादी, ताऊ ताई जी और चाचा चाची तो इनबिल्ट होते ही हैं, मौसा मौसी और फूफा फूफी का भी स्पेशल पैकेज होता है। फूफी को आप सुविधा के लिए बुआ कह सकते हैं, लेकिन फूफा जी टस से मस नहीं हो सकते।

मासी तो हम सभी जानते हैं, मां सी ही होती है लेकिन मौसा जी की कोई गारंटी

नहीं होती। लोग तो बिल्ली को भी शेर की मौसी कहते हैं, लेकिन मौसा जी कहीं नजर नहीं आते। रंगा बिल्ला जितनी भी इज्जत नहीं बिल्ली मौसी के पति महोदय की।।

अंग्रेजी में एक कहावत है, मैं चाहूं तो इस बहाने अंग्रेजी झाड़ सकता हूं, लेकिन उसे हिंदी में बयां कर मैं अपना बड़प्पन भी तो प्रदर्शित कर सकता हूं।

कुछ लोग महान होते हैं, और कुछ लोगों पर महानता थौंपी जाती है। मैं मौसा जी तो बहुत पहले से ही था, अभी कुछ दिन पहले किसी रिश्तेदार बच्ची ने मुझे फूफा जी का खिताब भी दे ही दिया। अब मैं भी सोफा कम बेड की तरह मौसा कम फूफा बन गया हूं।

अपने इस रिश्ते के अनुरूप मैं भी बहुत कोशिश करता हूं विवाह के अवसरों पर असंतुष्ट रहने की, सदैव मुंह फुलाने की, रूठ जाने की और भोजन नहीं खाने की। लेकिन अनुभव की कमी और पत्नी के असहयोग के कारण न तो कहीं मेरी दाल गली और न ही कहीं मैं ढंग से रायता ही फैला पाया।।

जब दुनिया के मौसाओं और फूफाओं को देखता हूं तो मुझे बड़ी ग्लानि होती है और हीनता का अहसास होता है। गजब का स्टैमिना होता है इन लोगों का। कभी लिफाफे में नेग के पचास रूपये देखकर बिखर जाना। क्या भिखारी समझ रखा है हमें। और अगर किसी मनचले ने छेड़ दिया, तो क्या हजार रुपए की औकात है आपकी ! बस, फिर तो बात हजार पर जाकर ही बन पाती है। सुंदरकांड के बीच यह एक और नया कांड ! बेचारी बुआ जी कैसे झेल लेती हैं ऐसे इंसान को।

मुझे डर है कहीं बढ़ती शिक्षा, समझदारी और परिपक्वता के चलते मौसाओं और फूफाओं की यह रूठने मनाने की विरासत समय के साथ लुप्त ना हो जाए। महिला संगीत की तरह ये भी मंगल प्रसंग के अभिन्न अंग हैं। भावी मौसाओं और फूफाओं को अब यह उत्तरदायित्व उसी जिम्मेदारी के साथ वहन करना होगा।

भले ही मुंह पर नहीं बोलते होंगे, लेकिन पीठ पीछे तो हमारे भी गुणगान होते ही होंगे। वैसे हम इतने खूसट हैं नहीं, जितने दिखाई देते हैं। आग्रह के कच्चे और मनुहार के पक्के होने के कारण हमारे मौसापने और फूफापने का कुछ पता ही नहीं चलता। समय के साथ अच्छी सेवाओं का आश्वासन तो फिर भी दिया ही जा सकता है। समझदार को इशारा काफी है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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