डाॅ राकेश सक्सेना
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – जेन जी संतान और मानसिक स्वास्थ्य: बढ़ती चुनौतियाँ एवं समाधान।)
☆ आलेख – जेन जी संतान और मानसिक स्वास्थ्य: बढ़ती चुनौतियाँ एवं समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
एक ही समयावधि में पैदा हुए और लगभग एक साथ बड़े हुए लोगों का समूह जनरेशन ( पीढ़ी ) कहा जाता है। आमतौर पर पन्द्रह से पच्चीस साल के अंतराल में पैदा हुए लोग एक पीढ़ी माने जाते हैं क्योंकि उन्होंने बचपन, स्कूल, तकनीक और सामाजिक बदलाव एक साथ देखे होते हैं। इनकी आदतें, भाषा, फैशन, सोचने का ढंग अक्सर मिलता-जुलता होता है। परिवार के स्तर पर पीढ़ी का स्तेमाल- दादा- दादी की पीढ़ी, माता-पिता की पीढ़ी, बच्चों की पीढ़ी के रूप में किया जाता है। समय और जन्म समय के आधार पर जनरेशन ( पीढ़ी ) के प्रमुख प्रकार बेबी बूमर्स, जनरेशन एक्स और मिलेनियल्स हैं। प्रत्येक पीढ़ी को एक खास समय सीमा और ऐतिहासिक माहौल से पहचाना जाता है, उदाहरणार्थ– साइलेंट जनरेशन ( 1928- 1945 ), बेबी बूमर्स ( 1946- 1964 ), जनरेशन एक्स ( 1965- 1980 ), मिलेनियल्स ( 1981-1996), जनरेशन जी ( 1997-2012 ), जनरेशन बीटा ( 2025- 2039 ) आदि।
जेन जी से तात्पर्य जनरेशन जैड है। ये उन लोगों की पीढ़ी है, जो 1997 से 2012 ई० के बीच पैदा हुए हैं। बेबी बूमर्स, जेन एक्स, मिलेनियल्स के बाद अल्फावेट में जैड आया, इसीलिए इसे जनरेशन जैड कहा गया, इसे जूमर्स भी बोलते हैं तथा जेन एल्फा से तात्पर्य ये वो लोग हैं जो लगभग 2010 से 2026 ई० के बीच पैदा हुए। ये पीढ़ी जन्म से ही इन्टरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों से परिचित रही है, इसलिए इसे डिजिटल नेटिव भी कहा जाता है। जेन जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसके पास ज्ञान के अनगिनत स्रोत उपलब्ध हैं किन्तु उसी के अनुपात में वह मानसिक दबाव, अकेलेपन,तुलना, भविष्य की अनिश्चितता और पहचान के संकट से जूझ रही है। बाह्य रूप से आत्मविश्वासी दिखाई देने वाली पीढ़ी अंदर से चिंता, अवसाद, तनाव, डिजिटल लत जैसी मानसिक समस्याओं का सामना कर रही है। सामाजिक अलगाव से आभासी दुनिया में तो ये सक्रिय दिखाई देते हैं किन्तु वास्तविक जीवन में अकेलापन अनुभव करते हैं।
आज अधिकांश युवा अपने जीवन की तुलना दूसरों की उपलब्धियों से करने लगे हैं। इन्स्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक पर दिखाई देने वाला जीवन वास्तविक चित्र नहीं होता, उसका सम्पादित स्वरूप होता है फिर भी युवा उसी को आदर्श मान लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनका आत्मविश्वास घटता है, स्वयं को असफल समझने लगते हैं, हीन भावना विकसित होने लगती है। डिजिटल एडिक्शन से इनको नींद कम आती है, सामाजिक सम्बन्ध कमजोर होते हैं। जेन जी ऐसे समय में शिक्षा प्राप्त कर रही है, जहाँ प्रतियोगिताएँ अत्यन्त तीव्र हैं। अधिक अंक, बेहतर काॅलेज, श्रेष्ठ नौकरी, विदेशी शिक्षा की दौड़ मानसिक दबाव उत्पन्न करती है। कैरियर की अनिश्चितता के कारण युवा लगातार सोचते रहते हैं कि कौन-सा कौशल सीखें? भविष्य में रोजगार मिलेगा या नहीं? माता-पिता व्यस्त हैं, बच्चे मोबाइल पर हैं, भोजन अलग-अलग समय पर होने से भावनात्मक संवाद कमजोर हो रहा है।
सोशल मीडिया जेन जी के जीवन का मुख्य अंग बन चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भी शिक्षा, रोजगार और रचनात्मकता के क्षेत्र में नयी सम्भावनाएँ खोलीं हैं। कई युवा यह सोचकर चिंतित रहते हैं कि भविष्य में मशीनें कहीं उनके कार्य का स्थान न ले लें, इसलिए आवश्यक है कि युवाओं में सृजनात्मक आलोचनात्मक चिंतन तथा मानवीय संवेदनाओं का विकास किया जाए। विद्यालय- महाविद्यालय स्तर पर नियमित मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम संचालित किए जाएँ। परिवार युवा के मानसिक स्वास्थ्य का सबसे मजबूत आधार होता है। जेन जी को भौतिक सुविधाओं के साथ-साथ भावनात्मक सुरक्षा की भी आवश्यकता होती है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों की बातें धैर्यपूर्वक सुनें, उनकी तुलना अन्य बच्चों से न करें, केवल अंक के आधार पर उनका मूल्यांकन न करें। भोजन, भ्रमण और पारिवारिक गतिविधियों के लिए नियमित समय निकालें। डिजिटल क्रांति के बाद अशोभनीय या आयु अनुपयुक्त यौन सामग्री अत्यन्त सरल बना दी गई है, जो उनकी आयु और मानसिक परिपक्वता के अनुकूल नहीं होता। कई बार जिज्ञासा, साथियों का प्रभाव आदि के कारण बच्चे ऐसी सामग्री के सम्पर्क में आ जाते हैं। इस चुनौती का समाधान केवल प्रतिबंधों में नहीं अपितु संवाद में निहित है। माता-पिता को बच्चों के साथ विश्वासपूर्ण सम्बन्ध विकसित करके उन्हें आत्मसंयम से समृद्घ करना होगा। शिक्षा, सरकार, परिवार व समाज सभी की संयुक्त जिम्मेदारी है कि वे इस दिशा में सकारात्मक वातावरण तैयार करें।
भारत में जेन जी दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या है। ये वर्तमान ही नहीं, भविष्य भी हैं, अत: भारतीय संस्कृति के अनुरूप इनको मन, बुद्धि और आत्मा के संतुलन पर बल देना ही होगा। योग, प्राणायाम, ध्यान, नियमित दिनचर्या, सत्संग, संगीत और प्रकृति के निकट ले जाना होगा, जो तनाव कम करने तथा भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में उपयोगी सिद्ध हो सकता है। परिवार संवेदनशील बनें, विद्यालय सहयोगी हों, समाज कलंकमुक्त दृष्टिकोण अपनाए और सरकार मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराए तो जेन जी की अपार क्षमता राष्ट्र निर्माण में प्रभावी योगदान दे सकती है।
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© डाॅ राकेश सक्सेना
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