डाॅ राकेश सक्सेना
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – दान और चंदा का दुरुपयोग: चुनौतियाँ एवं समाधान ।)
☆ आलेख – दान और चंदा का दुरुपयोग: चुनौतियाँ एवं समाधान ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
भारतीय संस्कृति दान और चंदा को धर्म, करुणा, परोपकार और लोकमंगल की भावना का मूर्तरूप माना गया है। दान का तात्पर्य केवल धन देना नहीं बल्कि किसी योग्य व्यक्ति या संस्था को निष्काम भाव से संसाधन, ज्ञान, समय अथवा सेवा प्रदान करना है। अन्नदान, विद्यादान, ज्ञानदान, जलदान, भूमिदान, वस्त्रदान, औषधिदान, रक्तदान, अंगदान, समय व श्रमदान को सात्विक सर्वोत्तम दान माना गया है, इसी के साथ आर्थिक सहयोग सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु लिया जाता है। वेद,उपनिषद, रामायण, महाभारत में दान को मनुष्य के श्रेष्ठतम गुणों में स्थान दिया गया है। श्रीमद्भागवत के अनुसार ‘त्यागेनैके अमृतत्वमानशु:’ अर्थात् त्याग और दान के माध्यम से ही अमरत्व की प्राप्ति सम्भव है। इसी प्रकार चंदा भी सामाजिक सहयोग का एक सशक्त माध्यम है, जिसके द्वारा समाज सामूहिक रूप से धार्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय कार्यों को सम्पन्न करता है। आधुनिक समय में जिस प्रकार दान और चंदे की राशि में वृद्धि हुई है,उसी अनुपात में उसके दुरुपयोग की घटनाएँ भी सामने आईं हैं। कई बार तो फर्जी संस्थाओं,अनधिकृत व्यक्तियों, अपारदर्शी प्रबंधन,निजी स्वार्थ,राजनीतिक लाभ अथवा आर्थिक अनियमितताओं के कारण दान और चंदा अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाता है। इससे न केवल दानदाता का विश्वास कमजोर होता है बल्कि वास्तविक जरूरतमंदों तक सहायता भी नहीं पहुँच पाती।
समय के साथ दान और चंदे के स्वरूप में व्यापक परिवर्तन आया है। ऑनलाइन, यूपीआई, बैंक ट्रांसफर आदि तकनीकी विकास ने दान को सरल बनाया है। दान और चंदा सामाजिक असमानता को कम करते हैं,प्राकृतिक आपदाओं में त्वरित राहत उपलब्ध कराते हैं,सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करते हैं,शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करते हैं। इस कारण दान और चंदा दोनों को ही सभ्य समाज की नैतिक पूँजी माना जाता है किन्तु अनेक बार इनका दुरुपयोग फर्जी संस्थाओं द्वारा धनसंग्रह, एकत्रित राशि का निजी उपयोग,लेखा-जोखा में पारदर्शिता का अभाव, धार्मिक या सामाजिक भावनाओं का अनुचित दोहन, आपदा के नाम पर धोखाधड़ी,नकली ऑनलाइन,दान खर्च का सार्वजनिक विवरण न देना आदि अनेक चुनौतियाँ हैं जिनके कारण समाज में दान और चंदे के प्रति अविश्वास बढ़ने लगता है। कुछ संस्थाएँ तो कागज पर विद्यालय,अस्पताल,अनाथालय,गौशाला चलाने का दावा करतीं हैं जबकि वास्तविकता में ऐसा कुछ नहीं होता। धार्मिक आयोजनों में रसीद प्रणाली, लेखा परीक्षण न होने से भी दुरुपयोग की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं।
दान और चंदा विश्वास पर आधारित व्यवस्था है। जब दुरुपयोग सामने आता है तो लोग सहायता देने से हिचकते हैं। सबसे अधिक हानि उन लोगों को होती है जो गरीब, रोगग्रस्त,अनाथ,दिव्यांग, आपदा पीड़ित हैं। जब दान का दुरुपयोग होता है तो लोगों में यह धारणा बनने लगती है कि दान देने से कोई लाभ नहीं। यह सोच समाज की सेवा- संस्कृति को कमजोर कर देती है। यद्यपि हमारे देश में इण्डियन ट्रस्ट एक्ट 1882, सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860,आयकर अधिनियम आदि व्यवस्थाएँ उपलब्ध हैं तथापि पारदर्शिता होने से दानदाताओं का विश्वास बढ़ता है। यदि कोई संस्था फर्जी चंदा जुटाती है, दान का दुरुपयोग करती है, झूठे दस्तावेज प्रस्तुत करती है तो उसके विरुद्ध त्वरित निष्पक्ष कार्यवाही होनी चाहिए। जनजागरूकता अभियान से लोगों को जानकारी दी जानी चाहिए कि केवल पंजीकृत संस्थाओं को दान दें,विवेकपूर्ण दान ही प्रभावी दान है। प्रत्येक संस्था को ईमानदारी अपनानी चाहिए, जनहित को सर्वोच्च रखना चाहिए,समय पर लेखा प्रस्तुत करना चाहिए। जब दान श्रद्धा से और चंदा उत्तरदायित्व के साथ संचालित होगा, तभी वह समाज में विश्वास, न्याय और समावेशी विकास का सशक्त माध्यम बन सकेगा।
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© डाॅ राकेश सक्सेना
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