डाॅ राकेश सक्सेना
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान।)
☆ आलेख – संवेदनात्मक संवाद: विभाजित समाज को जोड़ने की सशक्त पहल ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
संवेदना मानवीय गुण है, जिसमें व्यक्ति दूसरों की भावनाओं,पीड़ा, खुशी व परिस्थितियों को समझकर उनके प्रति करुणा, सहानुभूति और सहयोग का भाव रखता है। संवेदनशील व्यक्ति केवल परिस्थिति को जानता ही नहीं, महसूस भी करता है। उसके अंदर दूसरे के नजरिए से सोच पाने की समझ होती है, दु:ख को देखकर उसके मन में करुणा का भाव उत्पन्न होता है, सहयोग के लिए आगे आता है और समाज व प्रकृति के प्रति सजग रहकर अपनी जिम्मेदारी समझता है। समाज का निर्माण भावनाओं, संवेदनाओं और परस्पर विश्वास के आधार पर होता है। यदि संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान रह जाए और उसमें उसमें संवेदना, करुणा, सहानुभूति तथा सम्मान का अभाव हो जाए तो समाज में दूरियाँ, अविश्वास और संघर्ष बढ़ने लगते हैं। इसके विपरीत जब संवाद में मानवीय संवेदनाएँ जुड़ जातीं हैं तब वह बिखरे, विभाजित समाज को एकसूत्र में पिरोने का साधन बन जाता है। संवाद व्यक्ति को विरोधी नहीं बल्कि सहयात्री मानता है। इसमें मतभेद हो सकते हैं किन्तु मनभेद नहीं होना चाहिए। जब संवाद में सहानुभूति, धैर्य, सम्मान और करुणा का समावेश होता है तब वह संवेदनात्मक संवाद कहलाता है। सक्रिय एवं धैर्यपूर्ण श्रवण, भिन्न मतों का सम्मान, पूर्वाग्रहों से मुक्त दृष्टिकोण, भाषा में संयम व शिष्टता, समाधान केन्द्रित सोच, मानवीय गरिमा का संरक्षण, विश्वास निर्माण की प्रक्रिया आदि संवाद की प्रमुख विशेषताएँ होती हैं।
भारतीय संस्कृति में संवाद केवल सूचना का माध्यम नहीं, सत्य की खोज का साधन माना गया है। उपनिषदों में गुरू और शिष्य के बीच संवाद की परम्परा ज्ञान का आधार रही। गीता में अर्जुन और श्रीकृष्ण के मध्य संवेदनात्मक संवाद अनुपम उदाहरण है। विषादग्रस्त अर्जुन को श्रीकृष्ण युद्धभूमि में आदेश नहीं देते अपितु उसके मनोभावों को समझकर संशयों का समाधान करते हैं। रामायण में श्रीराम निषादराज, शबरी, सुग्रीव, विभीषण, हनुमान आदि से उनकी गरिमा के अनुरूप संवाद करते हैं। बौद्ध और जैन परम्परा में भी करुणा, अहिंसा और संवाद को परिवर्तन का आधार माना गया है। महात्मा गाँधी का सार्वजनिक जीवन संवाद की शक्ति पर ही आधारित था। उन्होंने विरोधियों से कभी संवाद बन्द नहीं किया। उनका कथन था कि– ‘ असहमति शत्रुता का कारण नहीं होनी चाहिए। ‘ प्रेमचंद की कहानियाँ सामाजिक विषमता को उजागर करते हुए करुणा और न्याय का संदेश देतीं हैं। कबीरदास की वाणी धार्मिक कट्टरता के स्थान पर मानवीय एकता का आह्वान करती है– ‘ ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय।। ‘ इसके अतिरिक्त ‘ वसुधैव कुटुम्बकम् ‘ तथा ‘ सर्वे भवन्तु सुखिन: ‘ जैसे भारतीय आदर्श संवेदनात्मक संवाद की वैश्विक भावना को अभिव्यक्त करते हैं।
समकालीन समाज आज अनेक प्रकार की चुनौतियों से जूझ रहा है। आज लोग वैचारिक ध्रुवीकरण के आधार पर समूहों में बँटते जा रहे हैं। मतभेद को शत्रुता समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। आर्थिक विषमता, शिक्षा में असंतुलन और अवसरों की असमान उपलब्धता सामाजिक दूरी का कारण बन रही है। छोटी-छोटी घटनाएँ भी बड़े सामाजिक तनाव का कारण बन जातीं हैं क्योंकि संवाद के स्थान पर अविश्वास बढ़ जाता है। सोशल मीडिया पर त्वरित प्रतिक्रिया, अपमानजनक टिप्पणियाँ तनाव उत्पन्न करतीं हैं। संयुक्त परिवारों के विघटन और व्यस्त जीवन-शैली ने आत्मीय संवाद के अवसर कम कर दिए हैं। इन मुश्किल हालातों में संवेदनात्मक संवाद अविश्वास को विश्वास में बदलता है, हिंसा के स्थान पर समझ विकसित करता है, समाज में सहिष्णुता बढ़ाता है, विविधता में एकता की भावना को मजबूत करता है, लोकतांत्रिक संस्कृति को सशक्त बनाता है, मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव को कम करता है तथा राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को गति देता है।
सारत: कह सकते हैं कि संवेदनात्मक संवाद सामाजिक स्थिरता, लोकतांत्रिक परिपक्वता, राष्ट्रीय एकता व विभाजित समाज को जोड़ने की एक सुन्दर सशक्त पहल है। मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है परन्तु मनभेद समाज की सबसे बड़ी चुनौती है। अत: आवश्यक है कि हम अपने भीतर सहनशीलता, धैर्य और परस्पर समझ को बढ़ाएँ! किसी को सुधारने का प्रयास प्रेम और श्रद्धा से करें! केवल निंदा या उपेक्षा से कोई सुधार नहीं होता। जहाँ प्रेम और संवेदनात्मक संवाद जीवित रहता है, वहाँ विश्वास जन्म लेता है और जहाँ विश्वास होता है वहाँ समाज विभाजन से ऊपर उठकर समरसता और प्रगति की ओर अग्रसर होता है।
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