डाॅ राकेश सक्सेना
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – नेतृत्व में अहंकार: चुनौतियाँ, दुष्परिणाम और समाधान।)
मुंशी प्रेमचंद
☆ आलेख – समाज के शुभचिंतक प्रेमचंद: सामाजिक परिवर्तन के अग्रदूत ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
(प्रेमचंद जयंती – 31, जुलाई)
प्रेमचंद हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ युगप्रवर्तक एवं समाज के शुभचिंतक कथाकार थे। उन्होंने विपुल संख्या में कहानियाँ, उपन्यासों, निबंधों आदि का प्रणयन किया, पत्र-पत्रिकाओं का सफल सम्पादन किया। आपका लेखन पूर्ण सोद्देश्य था। समाज की विकृतियों एवं समस्याओं का चित्रण कर उसे विशिष्ट आदर्श की ओर ले जाने के हेतु अपने विचारों में वे कहा करते थे कि‐- ‘ मनुष्य स्वभाव से देवतुल्य है। जमाने के छल, प्रपंच और परिस्थितियों के वशीभूत होकर वह अपना देवत्व खो बैठता है। साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करता है। ‘ इससे स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद साहित्य के माध्यम से कुशलता से, कलात्मक रीति से समाज के शुभचिंतक व सुधारक थे। शुभचिंतक वही होता है, जो आलोचना भी करे और रास्ता भी दिखाए। प्रेमचंद ने साहित्य के माध्यम से यही कार्य किया। उनकी आलोचना में सहानुभूति निहित थी। वे गरीब का मज़ाक नहीं उड़ाते थे। गोदान उपन्यास का होरी हारता है पर उसकी मेहनत और इज्जत को लेखक सलाम करता है। वे महाजन, पंडित की निंदा करते हैं, पर नफ़रत नहीं फैलाते।
प्रेमचंद समाज को राजा- महाराजाओं की दृष्टि से नहीं अपितु गाँव की चौपाल, किसान के खेत, विधवा की रसोई और महाजन के बहीखाते से देखा। गोदान का किसान होरी, कफ़न के माधव की गरीबी सिर्फ दया का विषय नहीं, शोषण की व्यवस्था का परिणाम है। बूढ़ी काकी, ठाकुर का कुआं आदि अनेक कहानियों में दहेज, पर्दाप्रथा, विधवा विवाह व घरेलू हिंसा को सवाल बनाया। वे किसी विशेष वर्ग के लेखक नहीं थे। उन्होंने किसान, मजदूर,स्त्री, दलित, निम्न मध्यवर्ग, बेरोजगार युवा, वृद्ध, अनाथ, वंचित आदि सभी को साहित्य का नायक बनाया। आपने उन लोगों को आवाज़ दी, जिनकी पीड़ा समाज सुनना नहीं चाहता था। वे भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव से व्यथित थे अत: उनकी कहानियाँ सामाजिक अन्याय का प्रतिरोध प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने बताया कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति नहीं बल्कि उसका चरित्र और कर्म है।
प्रेमचंद का अधिकांश जीवन गाँव में व्यतीत हुआ था, अत: उनको गँवई गाँव का चितेरा कहा जाता है। ग्राम्य जीवन के हर पहलू का उनको व्यक्तिगत अनुभव था लेकिन शहरी जीवन व वातावरण से भी वे अछूते नहीं थे। शहरी झलकियाँ आपके गोदान व गबन उपन्यास में देखी जा सकती हैं। गबन उपन्यास में शहरी निम्न मध्यवर्ग का चित्रण है तो गोदान में उच्च वर्ग के जमींदार, मिल-मालिक, शिक्षित प्रोफेसर पार्टियाँ देते-लेते रहते हैं, शराब- कबाब आम चलता है, खुला खर्चीला जीवन बिताते हैं, कारों में घूमते हैं। उन्मुक्त भोग और स्वच्छंद विहार शिक्षित नारियों और पुरुषों का जीवन-सिद्धांत बनता जा रहा है। शिक्षित नारी पाश्चात्य रंग में रँगी फैशन की पुतली बन रही है, जीवन में स्वार्थ अधिक मात्रा में घुसता जा रहा है। इस प्रकार वे शहरी जीवन की अनेक झाँकियाँ प्रस्तुत करके सामयिक समाज और वातावरण का सच्चा चित्रण करते हैं,जिससे इनके साहित्य में युगधर्म की पूरी रक्षा होती है।
सारत: प्रेमचंद ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने साहित्य का लक्ष्य मनुष्य को ही माना और उसके समस्त भावों-विचारों, उत्कर्षों व अपकर्षों को चित्रित किया। आपका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता पूर्व था। उनकी कहानियाँ पुरानी नहीं लगतीं क्योंकि मुद्दे वही हैं– कर्ज, बेरोजगारी, नारी, धर्म की राजनीति, अंतर सिर्फ इतना है कि स्वरूप बदल गया है। जमींदार के स्थान पर काॅर्पोरेट आ गया है। अत: प्रेमचंद का शुभचिंतक होना यही था कि वे समाज को कोसते नहीं थे, समझते थे और समझदार उसमें मनुष्यता बचाने का प्रयास किया करते थे।
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© डाॅ राकेश सक्सेना
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