मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – कुचलने को फूल भी थे और अरमान भी…
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
हरसिंगार के फूलों ने झर झर कर
ज़मीन पर ग़लीचा बना दिया था
इन पर कदम रखकर चले
नहीं नहीं, ये न हुआ उससे
सुंदर, आकर्षक, सुगंधित फूल, ऐसे कुचले जाएं
ये अन्याय न हो सका उससे
झुककर बीनने लगा फूलों को
और ढ़ेर सारे फूलों को लाकर
बरामदे में तन्हा बैठे बैठे ,वेणी बनाने लगा
फूलों की खुशबू और जागी भावनाओं का संगम हुआ
कुछ याद भी आया , अतीत में खोया यौवन
और उसने तैयार हुई वेणी को
अपनी वृद्धा पत्नी के सिरहाने रख दिया
यह सोचकर कि जब वो जागेगी
इसे देखकर कितनी खुश होगी
पर उस दिन वह फिर कभी जागी ही नहीं , नींद से
सोचने को विवश हुआ वह, कि शायद..
फूलों को उसने कुचलने से बचाया था पैरों से
सिर्फ़ अपने अरमानों को कुचलता देखने के लिये…!!!!!!
☆
© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





