श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ साहित्य भूषण महाकवि आचार्य भगवत दुबे व्यक्तित्व एवं कृतित्व – संपादक डा . संध्या जैन ‘श्रुति’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(एक साहित्यिक मूल्यांकन)

संस्कारधानी जबलपुर की उर्वरा साहित्यिक धरा पर जिस कालजयी प्रतिभा का उदय हुआ, वे हैं महाकवि आचार्य भागवत दुबे। एक ऐसा रचनाकार, जिसका संपूर्ण जीवन साहित्य की आराधना और लोक-मंगल के समर्पण में व्यतीत हुआ। यह व्यक्तित्व मात्र एक कवि का नहीं, अपितु उन मानवीय संवेदनाओं के संवाहक का है, जो शब्दों के माध्यम से समाज को नई दिशा और दृष्टि प्रदान करता है।

डा . संध्या जैन ‘श्रुति’

आचार्य दुबे का कृतित्व अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। हिंदी काव्य और गद्य की लगभग सभी विधाओं—गीत, नवगीत, दोहे, कुंडलियाँ, मुक्तक, गजल, बालगीत, हाइकू, कहानी और महाकाव्य—पर उनका समान अधिकार है।

पिछले कुछ दिनों पहले सुप्रसिद्ध साहित्यकार और राष्ट्रपति प्राप्त पुरस्कार शिक्षा विद डा. संध्या जैन श्रुति के कुशल और सफल संपादन में श्रद्धेय आचार्य जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर एक संग्रहणीय ग्रंथ का प्रकाशन किया गया। डा. संध्या जैन श्रुति एवं उनके संपादक मंडल के सुयोग्य सदस्यों श्री राजेश पाठक प्रवीण, डा.अभिजात कृष्ण त्रिपाठी, डा.डी .सी . जैन, श्री अशोक मनोध्या, डाअरुणा पांडेय, डा.श्याम मनोहर सिरोठिया, श्री मथुरा जैन उत्साही, श्री राजेन्द्र मिश्रा, श्री आशुतोष तिवारी, श्री सोहन परौहा सलिल, डा . अनिल कोरी, डा.मोहन तिवारी आनंद के महत्वपूर्ण मार्गदर्शन एवं सराहनीय प्रयासों से 404 पृष्ठों का यह शोध परक ग्रंथ आचार्य जी की साहित्य साधना पर आधारित साहित्य जगत की एक स्मरणीय और संग्रहणीय प्रस्तुति सिद्ध होगी ऐसी मेरी ही नहीं बल्कि साहित्यिक क्षेत्र के सुधी पाठक वर्ग की सार्थक सोच है।

राष्ट्रीय स्तर पर संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाले आचार्य भगवंत दुबे जी ने गद्य और पद्य दोनों ही में काफी लिखा है काफी अच्छा लिखा है और उनकी अभी तक शताधिक कृतियां प्रकाशित भी हो चुकी हैं और चर्चित भी।

आचार्य जी की सशक्त लेखनी से उपजी प्रत्येक पंक्ति आज साक्षात् अनुभूति का प्रमाण है। ‘दधीचि’ जैसा महाकाव्य उनके गंभीर चिंतन, सूक्ष्म शोध और निरंतर साधना का प्रतिफल है, जिसने उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर के रूप में प्रतिष्ठित किया है। उनका साहित्य केवल बाह्य सृजन नहीं, अपितु अंतस की वह निस्पृह साधना है, जो प्रकृति के मोहक परिवेश और सामाजिक यथार्थ के बीच एक सेतु का कार्य करती है।

उनकी रचनाधर्मिता में राष्ट्रीय चेतना, मानवतावाद और लोक-सरोकारों का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है। वे बुंदेली जन-संस्कृति के वाहक हैं, जो लोक-भाषा की मिठास और भावों की गहराई को मानक हिंदी की गंभीरता के साथ पिरोने में सिद्धहस्त हैं। उनके साहित्य में व्याप्त ‘रस-शृंगार’ और ‘लोक-संवेदना’ का अनूठा मिश्रणu पाठक को मंत्रमुग्ध कर देता है। वे एक ऐसे ‘लोक-मंगल’ के कवि हैं, जिन्होंने जीवन के कटु सत्य और विसंगतियों पर प्रहार करते हुए भी सदैव मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखा है।

आचार्य दुबे का साहित्य सृजन समय की वह उत्कृष्ट पहचान है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगी। उन्होंने केवल काल को शब्दों में नहीं बाँधा, बल्कि काल के प्रवाह में मानवता के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन भी किया है। यह कृतित्व उनकी उस विराट सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना निहित है। सरल, सौम्य और बहुभाषी व्यक्तित्व के धनी आचार्य जी का संपूर्ण जीवन ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का साक्षात उदाहरण है।

(चित्र – फेसबुक से साभार)

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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