श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – पगडंडी…
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कुछ राजपथ
कुछ स्वर्णपथ
मद-भोग के मार्ग
विलास के कुछ पथ,
चमचमाती कुछ सड़कें
विकास के ‘एलेवेटेड रास्ते‘,
चमक, चमचमाहट की भीड़ में
शेष बची संकरी पगडंडी-
जिससे बची हुई हैं
माटी की आकांक्षाएँ
और जिससे बनी हुई हैं
घास उगने की संभावनाएँ,
बार-बार, हर बार
मन की सुनी मैंने
हर बार, हर मोड़ पर
पगडंडी चुनी मैंने,
मेरी एकाकी यात्रा पर
अहर्निश हँसनेवालो!
राजपथ, स्वर्णपथ
विलासपथ चुननेवालो!
तुम्हें एक रोज
लौटना होगा मेरे पास
जैसे ऊँचा उड़ता पंछी
दाना चुगने, प्यास बुझाने
लौटता है धरती के पास,
कितना ही उड़ लो,
कितना ही बढ़ लो
रहो कितना ही मदमस्त,
माटी में पार्थिव का क्षरण
और घास की शरण
है अंतिम सत्य!
© संजय भारद्वाज
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गोविंद साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
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≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈



