श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है  स्त्री विमर्श पर आधारित एक संवेदनशील लघुकथा  “बेऔलाद । इस विचारणीय लघुकथा के लिए श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ जी की लेखनी को सादर नमन। ) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 100 ☆

? लघुकथा – ?? बेऔलाद ??‍♀️ ?

आठ बरस का दीपक रोज पास वाले ग्राउंड पर खेलने जाता था। आते समय अक्सर वह अपने दोस्त आकाश के यहां रुकता।

आकाश के यहां रोज कुछ ना कुछ बातों को लेकर कहा सुनी – लड़ाई होते रहती थी। जबकि घर में बेटा – बहू, सास – ससुर और उसका दोस्त आकाश। फिर भी क्यों?? लड़ाई होती है उसके समझ में नहीं आता। परंतु वह हमेशा ‘बेऔलाद’ शब्द का उच्चारण बार बार सुनता था।

आज लौटते समय पांव ठिठक गए। आकाश की दादी कह रही थी— उसे देखो बे औलाद हो कर भी कितना सुख, शांति और खुशी से घर-परिवार चल चला रहा है। किसी और का बेटा आज अपनों से भी ज्यादा सगा और वफादार है। तुझसे अच्छा तो मैं भी बेऔलाद होती!!!

दीपक की समझ में नहीं आया। घर आकर अपना सामान फेंकते हुए अपनी मां से पूछा— मम्मा यह  बेऔलाद क्या? होता हैं और वफादारी से इसका क्या संबंध। दूसरे कमरे में दादा दादी पोते की आवाज सुनकर सन्न हो गए।

मम्मी ने दीपक के मुंह को पोछते हुए कहा – – – बेटा बेऔलाद वे होते हैं जिनको भगवान ने एक अद्भुत शक्ति, सहनशीलता और बिना मां बाप के अनाथ बच्चों को सीने से लगाते, उसे पढ़ा लिखा कर योग्य बनाते हैं और सारी जिंदगी उसकी खुशी को अपनी खुशी समझते हैं।

ईश्वर इस नेक कार्य के लिए उनको बहुत-बहुत आशीर्वाद और सुखी होने का आशीर्वाद देते हैं। पास के कमरे से दादा-दादी की आंखों से खुशी की अश्रुधार बह निकली।

आँसू पोछ दादी बाहर आई दीपक को सीने से लगा लिया। उसी समय दीपक के पापा ऑफिस से घर के अंदर आए। मम्मी – पापा और नीरा के बहते आंसू देख जरा सा घबरा गया।

बोला – – क्या हुआ है? मुझे भी कुछ बताया जाएगा? पिताजी ने कसकर सीने से लगा लिया और कहा – – मुझे आज अपने भाग्य पर बहुत गर्व हो रहा है।

साक्षात भाग्यलक्ष्मी हमारे घर हैं।

पिताजी के सीने से लगे वह नीरा की ओर देख रहा था। 

बहुत ही मधुर मुस्कान लिए नीरा कहती है – – – आप सभी के लिए मैं चाय लेकर आती हूं। वह सभी के रोते रोते हंसी और हंसते हुए राज को समझ नहीं पा रहा  था।

पर दादा – दादी पूर्ण संतुष्ट। अपने दीपक के साथ खेलने लगे उन्हें अब भविष्य की चिंता नहीं थीं।  बेऔलाद का दर्द अब सदा सदा के लिए जाता रहा। मासूम दीपक सभी को खुश देख हंसने लगा।

   

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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