डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा ‘अम्माँ को पागल बनाया किसने ?’। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 131 ☆

☆ लघुकथा – अम्माँ को पागल बनाया किसने ? ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

‘भाई! आज बहुत दिन बाद फोन पर बात कर रही हूँ तुमसे। क्या करती बात करके? तुम्हारे पास बातचीत का सिर्फ एक ही विषय है कि ‘अम्माँ पागल हो गई हैं’। उस दिन तो मैं दंग रह गई जब तुमने कहा –‘अम्माँ बनी-बनाई पागल हैं। भूलने की कोई बीमारी नहीं है उन्हें।’

‘मतलब’? मैंने पूछा 

‘जब चाहती हैं सब भूल जाती हैं, वैसे फ्रिज की चाभी ढ़ूंढ़कर सारी मिठाई खा जाती हैं। तब कैसे याद आ जाता है सब कुछ? अरे! वो बुढ़ापे में नहीं पगलाईं, पहले से ही पागल हैं।’  

‘भाई! तुम सही कह रहे हो – वह पागल थी, पागल हैं और जब तक जिंदा रहेंगी पागल ही रहेंगी।‘

‘अरे! आँखें फाड़े मेरा चेहरा क्या देख रहे हो? तुम्हारी बात का ही समर्थन कर रही हूँ।’ ये कहते हुए अम्माँ के पागलपन के अनेक पन्ने मेरी खुली आँखों के सामने फड़फड़ाने लगे।

‘भाई! अम्माँ का पागलपन तुम्हें तब समझ में आया, जब वह बेचारी बोझ बन गईं तुम पर। पागल ना होतीं तो तुम पति-पत्नी को घर से बाहर का रास्ता ना दिखा दिया होता? तुम्हारी मुफ्त की नौकर बनकर ना रहतीं अपने ही घर में। सबके समझाने पर भी अम्माँ ने बड़ी मेहनत से बनाया घर तुम्हारे नाम कर दिया।‘ मेरा राजा बेटा’ कहते उनकी जबान नहीं थकती थी, पागल ही थीं ना बेटे-बहू के मोह में? बात- बात में एक दिन मुझसे कह गईं – ‘बेटी ! बच्चों के मोह में कभी अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी ना मार बैठना, मेरी तरह।‘ 

भाई! फोन रखती हूँ। कभी समय मिले तो सोच लेना अम्माँ को पागल बनाया किसने??

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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