श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता यह कैसा समभाव है…”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३३ ☆

☆ # “यह कैसा समभाव है…” # ☆

जिंदगी तूने दिए

यह कैसे घाव है

धूप ही धूप है

नहीं कोई छांव है

 

जख्म है रिसते हुए

अरमान हैं पीसते हुए

छटपटाती काया है

लहूलुहान पांव है

 

पेड़ कट रहे हैं

जंगल घट रहे हैं

बंजर हो गई है धरा

खुश होते राव है

 

प्रकृति का तांडव है

असहाय सा मानव है

फट रहे हैं बादल

विलुप्त होते गांव है

 

सागर में उफान है

लहरों में तूफान है

मांझी दुविधा में है

भंवर में फसी नांव है

 

यह उजड़ती हुई बस्तियां

चुपचाप खड़ी हस्तियां

बिक रहा है हर कोई

लग रहे बड़े-बड़े दांव है

 

यहां घुट रही हर सांस है

यहां टूट रही है आस है

तू फिर भी है खामोश खड़ा

यार, यह कैसा समभाव है ?

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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