श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “टूटते रिश्ते…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४८ ☆

☆ # “टूटते रिश्ते…” # ☆

टूटते रिश्ते हैं टूटते परिवार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

बचपन से जिसे संभाला

वह रूठ गया

सांसों से बंधा रिश्ता

अचानक टूट गया

उम्मीद थी जिसे

वह सब कुछ लुट गया

हमारा दर्द अंदर ही अंदर

घुट गया

अब रिश्ते नहीं बस व्यापार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

कहां जाएं हम

छोड़कर यह दुनिया

हमें रास नहीं आ रही

यह दुनिया

कितनी बेरहम हो गई है

यह दुनिया

रोज नए-नए जख्म

दे रही है यह दुनिया

दुनिया में प्रेम नहीं दुखों की भरमार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

हवाओं में कड़वाहट

ईर्ष्या की गंध है

आपस में बेरूखी

प्रचंड द्वंद है

नफरत फैलाते समाज में

कुछ लोग चंद है

सत्य और समझदारी की बातें करना बंद है

सांप्रदायिकता करना अब तो कारोबार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है

 

आजकल संवेदनाएं मर गई है

स्वार्थ की लालसा भर गई है

सच्चाई झूठ से डर गई है

रिश्तो को निरर्थक कर गई है

रिश्ते सांसों पर बोझ और भार है

सब पराए हैं किसका ऐतबार है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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