श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “उदास बसंत…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४९ ☆
☆ # “उदास बसंत…” # ☆
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यह कैसी बसंती पवन चली है
मुरझाए फूल उदास हर कली है
डाली से फूल झरने लगे हैं
भ्रमर भी आह भरने लगे हैं
वीरान हो गई है वाटिका
पतझड़ से सब डरने लगे हैं
मौसम ने यह कैसी चाल चली है
मुरझाए फूल उदास हर कली है
आकाश में उड़ती हुई पतंग है
मांझे और धागे में मची हुई जंग है
मांझे पर चढ़ा कट्टरता का रंग है
मांझे से कट रहे वंचितों के अंग है
लहुलूहान अंगो से भरा हर चौराहा हर गली है
मुरझाए फूल उदास हर कली है
पीली पीली सरसों पीले पीले वस्त्र है
बसंती नैनों में कटार से अस्त्र है
पीले को रक्तिम करने पढ रहे वह मंत्र है
उनकी इच्छापूर्ति में लगे सारे तंत्र है
बसंत की मादकता धूमिल हो चली हैं
मुरझाए फूल उदास हर कली है
यह कैसी बसंती पवन चली है
मुरझाए फूल उदास हर कली है/
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© श्याम खापर्डे
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