श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “धर्म वही होता बड़ा”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २०७ – धर्म वही होता बड़ा ☆
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धर्म वही होता बड़ा, जिसमें हो सद्भाव।
प्रेम दया ममता क्षमा, उपकारी हों भाव।।
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मानवता से कब बड़ा, जग ने समझा मर्म।
आदम युग के बाद ही, उपजे हैं सब धर्म।।
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बैर बुराई तामसी, नहीं धर्म के अंग।
मारकाट हिंसा सभी, हैं अधर्म के रंग।।
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कट्टरता जब धर्म में, घुस जाती है घोर।
मूल भाव खोते सभी, कभी न होती भोर।।
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शून्य भाव जबसे हुये, चुभे दिलों में शूल।
प्रेम और सद्भाव ही, सब धर्मों का मूल।।
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धर्म सभी हैं खो गये, अब कट्टरता साथ।
राम रहीम ईसा-मसि, पीट रहे हैं माथ।।
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मानवता ही धर्म है, मुख्य धुरी है एक।
भारत की संस्कृति में, यही बात है नेक।।
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हम उदारवादी रहे, लेकर सबको साथ।
सदियों से हैं चल रहे, पकड़े सबका हाथ।।
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स्वागत करना जानते, और झुकाना माथ।
पर यह कभी न सोचिए, बंधे हुये हैं हाथ।।
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शिक्षा मिली सनातनी, वेदों से यह ज्ञान।
सारा जग है जानता, भारत देश महान।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
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