आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – चंद अश’आर।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६५ ☆
☆ चंद अश’आर ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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दस्तक दरे-दिल पर न देता दोस्त हो
दिन न मुझको जिंदगी में देखना है।
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दोस्त दरिया दिल दयानतदार दे
जिंदगी ने जिंदगी कर दी अता।
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दिल! दुखाना मत कभी दिल दोस्त का
मुआफी मौला नहीं देगा तुझे।
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तीरगी में दोस्त ही बनकर दिया
साथ मेरे उम्र भर चलता रहा।
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बाँह थामी दोस्त की बर्बाद ने
दोस्ती ने कर दिया आबाद झट।
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दोस्त को साया कभी मत बोलना
वह नहीं यह अँधेरे में साथ दे।
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दोस्त के लगकर गले ऐसा लगा
चाँद-सूरज जमीं पर मिलते गले।
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कयामत कुदरत ने ढाई दोस्त पर
दोस्त बोला- ‘छोड़ उसको, मुझपे ढा।
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दोस्ती ने तर्क सारे फर्क कर
दो दिलों को एक कर ही दम लिया।
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
२७.१.२०२६
संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,
चलभाष: ९४२५१८३२४४ ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





