श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन में आलस्य का। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०८ – जीवन में आलस्य का… ☆

जीवन में आलस्य का, बढ़ता जाता रोग।

व्यर्थ समय है बीतता, घटे लाभ का योग।।

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कार्य पूर्ण होते नहीं, बढ़ता जाता भार।

जनता पिसती है सदा,पड़ती भारी मार।।

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गलत राह पर ये चलें, करें देश बदनाम।

जब चाहे हड़ताल से, करते चक्का जाम।।

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घर में ही बैठे रहें, करें जतन दिन रात।

अधिकारों की आड़ ले, देते रहते मात।।

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नेतागीरी में लगे, खूब मचाते शोर।

कामकाज करते नहीं, निज स्वारथ पर जोर।।

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सरकारी हर तंत्र में, ऐसों की भरमार।

कभी मुक्ति इनसे मिले,तब होगा उपकार।।

*

यही हाल हर घर सखे, मचता बड़ा बवाल।

मूर्तवान आलस्य ही, घर में करें धमाल।।

*

बैठ घरों में कर रहे, फेमस अपना नाम।

मोबाइल में खो रहे, रोज सुबह औ शाम।।

*

लाइक औ शेयर करें, मेसेज सुबह शाम।

व्हाटसएप व फेस बुक, चेटिंग में बदनाम।।

*

खाने में आगे रहें, मुख से छीनें भोग।

काम चोर मस्ती करें, मेहनत करते लोग।।

*

कर्तव्यों से विमुख हैं, धरे हाथ पर हाथ।

समय बीतने पर यही, सदा पीटते माथ।।

*

जीवन दर्शन अब यही, छाया है चहुँ ओर।

अगर ग्राफ बढ़ता गया, कैसी होगी भोर।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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