श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “ख्वाहिशों की होली”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५६ ☆
🌻लघु कथा🌻 ख्वाहिशों की होली🌻
शहर के बीचो-बीच जहाँ से चारों तरफ रास्ते मोड निकलते हुए चले जाते हैं रह जाती है बस ख्वाहिशें।
कुछ यादें और एक सफर जो कभी यहाँ से वहाँ, कभी वहाँ से यहाँ, आज सृष्टि के पास फिर वही बात थी— बेतहाशा प्यार करने वाला पति, भरा पूरा परिवार, खुलकर जी लेने की चाहत और मन में न जाने कितने सपने उमंगों को लेकर वह चल पड़ी थी, पिया के घर अनजाने ही सही जिस डोर से वह बँधने जा रही थी, शायद उसे वह भी नहीं जान सकी थी– उसे बसंत, फाग और होली का रंग चढ़ने लगा था।
वह और भी उतावली होकर उस पल का इंतजार कर रही थी कि जिस पल वह अपने पिया के रंग में रंग, सारी दुनिया को अबीर की चमक और सतरंगी धनुष सी सरपट भागती, शायद बादलों की ओट में छिपती हुई ख्वाहिशें सपनों के साथ बुन चली।
अनजाने में वह कुछ भी न जान सकी। जिसे उसे जानने का अधिकार था। जान सकी तो बस वह इतना ही कि उसका पति अपना नहीं किसी और का है। होली के मस्ती प्यार का रंग, ढोल नगाडे के बजाने की आवाज और खुलकर जी लेने की चाहत, आज इन सब ख्वाहिशों को वह फिर से उसी चौराहे पर होलिका में जला देना चाह रही थी।
जहाँ से वह आरंभ हुआ था। इसी अनजाने मोड़ पर वह समीर से मिली थी। पल-पल मिलन और मिलन के बाद ख्वाहिशों को आजाद परिंदों की तरह उड़ने का सपना दिखा वह छोड़ चला इस मोड़ पर जहाँ पर होलीका जल रही थी।
सृष्टि अपने साथ हुए जख्मों को नहीं भर सक रही थी—- कि किस कदर वह परिवार के बड़े बुजुर्गों के मना करने के बाद भी समीर के साथ घर बसाने की सोच रही थी, परंतु समीर तो एक हवा का झोंका था न जाने कब आया जिंदगी में और जब गया तो फिर कब आएगा।
वह सोच- सोच कुछ सामानों को जो सहेज कर रखी थी। पेपर के पन्नों के साथ लपेट ले चली होलिका में जलाने। अपने ख्वाहिशों की होली का जलन, शायद यही उसकी होली थी।
गाना बजने लगा–होलिया में उड़े रे गुलाल – – –
ख्वाहिशों का रंग गुलाबी क्यों नहीं होता। क्यों मनचाहे रंग भरने लगते हैं????
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





