श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “करुण पुकार”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५९ ☆
🌻लघु कथा🌻 🛕 करुण पुकार🛕
मंदिर के पास घर निवास होने से सभी प्रकार के आराधना प्रार्थना की आवाज आती रहती है। कभी बच्चे होने का बधावा, कभी मुंडन में रोती किलकारी, कभी कन्या भोज, कभी देवी पूजन, कभी बेटी की बारात में माता पूजन, कभी बहू के आने के बाद मंदिर में चढ़ावा, और कभी किसी के अपने से बिछड़ जाने पर शांत मन से बैठ सीढियों पर बातें करना।
घंटी और साज बाजे की आवाज बदल जाती है। कभी शहनाई, कभी ढोल, कभी मृदंग, कभी मंजीरे की झनक और कभी सिसकती आँहे, सिर्फ घंटी की पुकार, परंतु ईश्वर को पाने या उनसे मन्नत करने का तरीका अलग-अलग परंतु ठिकाना सबका एक।
आज सुबह आरती वंदन के बाद घंटी की आवाज थोड़ी धीमी सी आ रही थी, परंतु शोर शराबा कुछ बाँटने का हो रहा था। मंदिर प्रांगण भीड़भाड़ से भरा था। नीचे – ऊपर, आती- जाती, सीढ़ी पर बैठी अम्मा का गीत आज ऊंचे स्वर पर कुछ प्रसन्नता पूर्वक आ रही थी – – – जो अक्सर बैठकर करुण पुकार करती रहती थी।
धीरे से सविता ने पूछा अम्मा क्या बात है। आज करुण पुकार की जगह मीठे- मीठे गीत गा रही हो। बिटिया— आज बरसों बाद मेरा बेटा अपना बेटा लेकर आ रहा है। उसने मुझे बताया है कि मंदिर में आ जाना देख लेना। बस उसी का इंतजार कर रही हूँ।
सविता आश्चर्य से देखती रही क्या?? तुम्हें ले जाएगा।
अरे कहाँ। मैंने उसे अपना बनाया था। अनाथ को लालन-पालन कर पढ़ा लिखा बड़ा किया।
बिटिया उसने मुझे अपना थोड़े ही माना था। मेरी संतान नहीं है वह।
सविता तो बस सुनकर हृदय से गमगीन हो गई। जिस बच्चे के लिए वह तड़प रही है। वह तो सिर्फ उसे एक नौकरानी (आया) समझ रहा था।
इससे तो अच्छा था वह स्वयं ही अनाथ रहती किसी अनाथ को सनाथ बनाते। उसकी करुण पुकार बाजे शहनाइयों के बीच दब गई।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




