श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # ३४८ दो किनारे… ?

लोग प्राय: कहते हैं कि हमारा / उनका / फलां का  प्रेम नदी के दो किनारो की तरह है, जो साथ बहता तो है, समानांतर चलता तो है पर आपस में कभी मिल नहीं पाता। ध्यान देना, नदी के दो किनारे आपस में जुड़े होते हैं अपनी लहरों, अपने प्रवाह, अपने भीतर के बहाव अर्थात जलराशि के माध्यम से। कभी देखा तुमने कि एक किनारा पूर्व की ओर बढ़ रहा हो और दूसरा पश्चिम की ओर। वे आजीवन साथ चलते हैं, जलराशि उन्हें जोड़े रखती है, अंतर्भूत भावनाओं की तरह। दो तटों के बीच एक अनदेखा सेतु बना रहता है। एक किनारे यदि थपेड़े बढ़ते हैं तो दूसरा किनारा उसे संतुलित करने का प्रयास करता है। दूसरी ओर थपेड़े बढ़ते हैं तो पहला संतुलन की भूमिका में आ जाता है। आशंका, संभावना सबको मिलकर थाम लेते हैं दोनों किनारे।

भीतर तूफान के थपेड़े,

बाहर सैलानियों के फेरे,

आशंका-संभावना में

समन्वय साधे रखता है,

कितने अंतर्विरोधों को

हर तट थामे रखता है..!

इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि सच्चा प्रेम यही है। सच्चा प्रेम एक दूसरे का साथ निभाने में, एक दूसरे के प्रति मोहित रहने में, साथ चलने में है। कुछ हद तक विरह में है। ऐसा इसलिए कि मिलन के बाद होता है विकर्षण पर विरह में बना रहता है सदैव परस्पर आकर्षण।

ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि का वरदान दिया है। विचार करना कि दोनों किनारे यदि मिलकर एक हो जाएँ तो एक पतली-सी जलधारा तो होंगे पर नदी नहीं हो सकते। नदी का पाट किनारों के विस्तार का पाठ है।नदी किनारे बस्तियाँ बसती हैं, नदी किनारे सभ्यताएँ पनपती हैं। नदी में मछलियों का वास है, नदी में छोटे-बड़े जीव जंतुओं का अधिवास है। नदी जल का स्रोत है। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं हो सकती। कल्पना कीजिएगा, नदियाँ नहीं होतीं तो मनुष्य का जीवन कैसा होता? कल्पना को पीछे छोड़ता यथार्थ तो यह है कि नदी या जलस्रोत के अभाव में जीवन संभव भी नहीं होता।

और जीवन क्या है? दर्शन कहता है, जीवन अद्वैत का जागरण है। अद्वैत जीवन में प्रेम को जगाता है। और प्रेम का अर्थ केवल मिलन नहीं होता। यूँ मिलन किसे कहते हो तुम? पार्थिव मिलन ही यदि मिलन की परिभाषा होती तो फिर विरह का अस्तित्व कैसे होता? विरह में भी सूक्ष्म का मिलन तो समाहित है ही न! स्मरण रखना, प्रेम बहुआयामी होता है, एकांगी नहीं।

नदी के दो किनारे प्रेम के शाश्वत प्रतीक हैं। सच्चा प्रेम वही है जिसमें साथ चलें, समानांतर चलें, एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें। सृष्टि को कुछ दे सकें, जगत से जो पाया, उसका कुछ अंश लौटा सकें। जगत में प्रेम-संजीवनी बनकर बह सको, बिना किसी अपेक्षा के निरंतर चल सको तो जीवन कल-कल बहती सार्थकता में परिवर्तित हो जाता है। जीवन के किनारे रह जाना है या किनारा बनकर पाट का पाठ पढ़ना और पढ़ाना है, इसका निर्णय तुम्हें  स्वयं करना है।

© संजय भारद्वाज 

(9:45 बजे, 18 नवम्बर 2025)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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