श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “वो तज़ुर्बों के मदरसे का पढ़ा है“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४५ ☆

✍ वो तज़ुर्बों के मदरसे का पढ़ा है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

अपने ईमान को कमजोर बनाता क्यूँ है

ख़ुद के किरदार को  इंसान गिराता क्यूँ है

 *

है ये अच्छा कि निकल जाए किनारा करके

दिल नहीं मिलता है तो हाथ मिलाता क्यूँ है

 *

बेचकर कोई पकौड़े न बना अंबानी

शेख चिल्ली के हमें ख़्वाब दिखाता क्यूँ है

 *

इस खराबात के रस्ते की तबाही मंज़िल

हर बशर जानता पर खुद को चलाता क्यूँ है

 *

हैसियत की हो जहाँ क़द्र हुनर से बढ़कर

ऐसी महफ़िल में ए फ़नकार तू जाता क्यूँ है

 *

वो तज़ुर्बों के मदरसे का पढ़ा है समझे

बाप को आज कोई पुत्र सिखाता क्यूँ है

 *

वस्वसा दिल से नहीं दूर हो तो जाँ ले लो

आज़मा के तू मुझे रोज़ सताता क्यूँ है

 *

सामने सबके नज़र भी न उठा के देखे

वक़्त बे वक़्त मुझे घर पे बुलाता क्यूँ है

 *

पान मुझको न दिया मान लिया हो गुस्सा

गैर को हाथ से तू अपने खिलाता क्यूँ है

 *

है बराबर के जो बेटे तो मदद ले उनकी

बोझ काँधों पे सभी घर का उठाता क्यूँ है

 *

भूलिए शौक़ वो तकलीफ़ दे मख्लूक़ को जो

मुर्ग तीतर व बटेरों को लड़ाता क्यूँ है

 *

हाथ सोने को लगाऊँ तो हो जाता माटी

इतना नाराज़ हुआ मुझसे विधाता क्यूँ है

 *

एक फक्कड़ से जरूरत जो वो सीखी न अरुण

दाँव पर ज़र के लिए जान लगाता क्यूँ है

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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