डॉ भावना शुक्ल
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – मन मोहन ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # ३१६ – साहित्य निकुंज ☆
☆ भावना के दोहे – मन मोहन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆
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करते तेरी वंदना, हम तो आठों याम।
मन मोहन से पूछती, कब आओगे श्याम।।
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अंतस् की पीड़ा बढ़ी, कहाँ छुपी मुस्कान।
अभिनय तुम करना नहीं, उससे तुम अंजान।।
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मीत हमारी प्रीत का, तुझे नहीं है भान।
अब तो मुझको समझ लो, तुझमें बसती जान।।
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शर्त नहीं हमने रखी, प्रेम किया आगाध।
दोष नहीं तुमको दिया, बस मेरा अपराध।।
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© डॉ भावना शुक्ल
सहसंपादक… प्राची
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




