डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२५ – साहित्य निकुंज ☆

☆ लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

कॉलेज के दिनों की बात है। उन दिनों पर्यावरण संरक्षण पर हमें बड़े प्रेरक पाठ पढ़ाए जाते थे। अध्यापक बताते थे कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि मानव जीवन के आधार हैं। उनकी बातें मेरे मन में इतनी गहराई से उतर गईं कि मैंने निश्चय कर लिया है जीवन में जहाँ भी अवसर मिलेगा, मैं वृक्ष अवश्य लगाऊँगा।

उस दिन के बाद वृक्षारोपण मेरे लिए केवल एक सामाजिक कार्य नहीं रहा, बल्कि एक भावनात्मक दायित्व बन गया। किसी के जन्मदिन पर, किसी के विवाह के अवसर पर या किसी शुभ कार्य के आरंभ में मैं एक पौधा अवश्य लगाता। मुझे विश्वास था कि यदि प्रत्येक व्यक्ति एक-एक वृक्ष भी लगाए, तो धरती की हरियाली कभी समाप्त नहीं होगी।

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। देखते ही देखते कई वर्ष बीत गए। एक दिन मुझे उस गाँव जाने का अवसर मिला जहाँ वर्षों पहले मैंने आम का एक पौधा लगाया था। गाँव पहुँचते ही लोगों ने बड़े प्रेम से मेरा स्वागत किया और खाने के लिए ताज़े आम लाकर रख दिए। आमों का स्वाद अद्भुत था। बातचीत के दौरान किसी ने मुस्कराकर कहा, “ये उसी वृक्ष के फल हैं जिसे आपने वर्षों पहले लगाया था।”

यह सुनते ही मैं कुछ क्षणों के लिए मौन रह गया। मेरी आँखें अनायास उस वृक्ष को खोजने लगीं। सामने एक विशाल आम का वृक्ष खड़ा था, जिसकी शाखाएँ फलों से लदी हुई थीं। मुझे लगा जैसे वह वृक्ष मुझे पहचान रहा हो। बरसों पहले मेरे हाथों से मिट्टी में रोपा गया छोटा-सा पौधा आज एक विशाल वृक्ष बनकर न केवल फल दे रहा था, बल्कि अनेक लोगों को छाया और सुख भी बाँट रहा था। उस क्षण मेरे हृदय में जो संतोष और प्रसन्नता थी, उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।

लेकिन उसी यात्रा में एक ऐसा दृश्य भी देखने को मिला जिसने मन को उदासी से भर दिया। सड़क के किनारे मैंने बरगद, पीपल और आँवले के कई पौधे लगाए थे। मैं उत्सुक था कि वे अब बड़े वृक्ष बन चुके होंगे और राहगीरों को छाया दे रहे होंगे। परंतु जब वहाँ पहुँचा, तो देखा कि सड़क चौड़ी करने के लिए उन सभी वृक्षों को काट दिया गया था। जहाँ कभी हरियाली लहराती थी, वहाँ अब केवल धूल, पत्थर और कंक्रीट दिखाई दे रहे थे।

उन कटे हुए ठूँठों को देखकर ऐसा लगा मानो किसी ने मेरे अपने परिवार के सदस्य छीन लिए हों। मन भारी हो गया। एक ओर उस आम के वृक्ष की सफलता का आनंद था, तो दूसरी ओर कटे हुए वृक्षों का दर्द। उसी क्षण मुझे अनुभव हुआ कि वृक्ष केवल पेड़ नहीं होते, वे हमारी स्मृतियों, भावनाओं और भविष्य से जुड़े होते हैं।

घर लौटकर मैंने अपने आँगन में लगे उन वृक्षों को देखा जिन्हें मैंने स्वयं रोपा था। वे हवा में झूम रहे थे। उनकी हरी पत्तियाँ मानो मुझे संदेश दे रही थीं-“जो हमें जीवन देता है, हम उसे कई गुना लौटाते हैं।”

मैंने उसी दिन फिर एक संकल्प लिया कि चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, वृक्षारोपण का कार्य कभी नहीं छोड़ूँगा। कटे हुए वृक्षों का दुःख मनाने से अधिक आवश्यक है नए वृक्ष लगाना। क्योंकि वृक्ष केवल हमें ऑक्सीजन नहीं देते, वे आशा देते हैं, जीवन देते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुंदर संसार छोड़ जाते हैं।

आज भी जब उस आम के वृक्ष की याद आती है, तो ऐसा लगता है मानो वह मुझे आशीर्वाद दे रहा हो। तब मेरे मन से एक ही बात निकलती है-वृक्ष लगाना प्रकृति की सेवा ही नहीं, बल्कि आने वाले कल के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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