सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जीवित हम जलते गाँधी…।
रचना संसार # ९८ ☆
☆ गीत – जीवित हम जलते गाँधी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
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सत्य अहिंसा प्रेम खो गया,
जीवित हम जलते गाँधी।
छलनी बंदूकों से छाती,
बस आँसू बहते गाँधी।।
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रोती फिरती भावुक विमला,
नोचे बन दानव सारे।
पुरबी हवा हुई बोझिल है,
आये पश्चिम के धारे।।
भूले वेद धर्म सनातनी,
सत्य बात कहते गाँधी।
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घाव प्रदूषण देता गहरा,
जले धूप से है काया।
आहत मंदिर-मस्जिद दोनों
नेताओं की है माया।।
बजता डंका महँगाई का
दंश सभी सहते गाँधी।
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वैचारिक मतभेद हुए हैं,
घुन लगती सुविधाओं में।
मधुमक्खी के छत्ते लगते,
संत रहें दुविधाओं में।।
मंगल गीतों का टोटा है,
हम दुख में पलते गाँधी।
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अनुशासन का नाम नहीं अब,
आँधी हैं हड़तालों की।
कुहरा छाया है युद्धों का,
कूटनीति घडियालों की।।
ओढ़े चादर लाचारी की,
हाथ सभी मलते गाँधी।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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