आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – नवगीत – राम लला की राम निधि)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८४ ☆

नवगीत – राम लला की राम निधि ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

राम दास ने

राम कृपा बिन

राम लला को लूट लिया।

.

राम हितैषी बनकर आया

राम दयालु बोल मुस्काया।

राम सखा हनुमत की जय कह-

रामानुज को गले लगाया।।

भोंक पीठ में

छुरा ठठाया

कालकूट का घूँट दिया।

राम दास ने

राम कृपा संग

राम लला को लूट लिया।

.

सकल राम निधि अपनी मानी।

कहे राम-सिय हैं वरदानी।।

राम निहोरा महज दिखावा-

राम नाथ बनता अभिमानी।।

राम भक्त के

भक्ति भाव को

झूठ-दगा कर शूट किया।

राम दास ने

राम कृपा संग

राम लला को लूट लिया।

.

राम बिहारी कलि मल हारी

छलिया जै-जैकार पुकारी।

कर परिक्रमा अवसर ताके-

हेरें चकित राम महतारी।।

राम भरोसे

राम नाम को

रामधारी ने हूट किया।

राम दास ने

राम कृपा संग

राम लला को लूट लिया।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

२४.६.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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