श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “ज़रूरतमंद” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १५० ☆
☆ ज़रूरतमंद ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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शहर के हर चौराहे पर
आज भी इकट्ठे होते हैं लोग
काम की तलाश में
कहीं भटकते नहीं है
बस खड़े रहते है
इस आस में कि कोई ज़रूरतमंद
आकर उन्हें ले जाएगा
अपने साथ लेकर चलते हैं
दिन भर का भोजन पानी
जैसे-जैसे दिन ऊपर चढ़ता है
उनकी आस उसी तरह
कम होती जाती है
सर्वहारा वर्ग आज भी
आशाओं और व्यवस्था के बीच
झूलता लटकता अपना और
अपने परिवार का बोझ ढोता
ज़िंदा है इस कायनात में
इन असंगठित लोगों के लिए
सरकारों की प्रतिबद्धता
सिमट कर रह जाती है सिर्फ़ काग़ज़ों में
जो शायद ही कोई
साकार रूप ले पाती है
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
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