श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५८ ☆
☆ लघुकथा ☆ ~ गर्भस्थ शिशु ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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माँ के गर्भ में फंसा शिशु, गर्भ से बाहर निकलने का इंतजार कर रहा था लेकिन न जाने क्यों, वह बार-बार आगे पीछे की सोच रहा था। कभी तो उसके मन में आता कि बाहर चला आऊं और फिर कभी वह स्वयं को वापस गर्भ की ओर लेकर चला जाता।
यद्यपि वह यह सोचकर वह बाहर आना चाहता था कि उसे एक बहुत बड़ी दुनिया देखनी है, लेकिन जब उसे यह भी लगता कि बाहर आने पर जब लोग उसे वैश्या का बेटा कह कर ताना मारेंगे तो कहीं उसकी खुशहाली को तरसती जिंदगी नरक न बन जाए।
वह घोर चिंता में डूबा हुआ था। अचानक हिंदी के एक बड़े लेखक के लिखे एक लेख को जो एक पाठक द्वारा अपने मित्र श्रोता को पढकर सुनाई जा रही थी, उसकी आवाज उस गर्भस्थ शिशु के कान में पड़ गयी।
उस बड़े लेखक के व्यंग आलेख को पढ़ते हुए गंभीर श्रोता ने कहा – भाई ध्यान से सुनो! इस ख्याति प्राप्त लेखक ने क्या लिखा है। लेखक ने लिखा है कि –
“औरत ने बच्चे की गर्दन अब छोड़ी। उसने बच्चे का मुख चूम लिया और अस्पताल से चल निकलने के लिए तत्पर हो गई। उसने जाते – जाते बच्चे से कहा, “किसी तरह पल ही जाओगे। बड़ा होने पर मेरे कोठे में जरूर आना। पहचान जाऊँगी तो अपने पेट से निकला हुआ बेटा कहूँगी, न पहचानूँ तो अपने पेट के लिए तुम्हें अपना शरीर दूँगी।”
नहीं.. नहीं.. लेखक ने एक सच्चाई व्यंग्य में लिखा था, जो अक्सर होता है।
लेकिन मेरी इस कहानी का बच्चा और मां ऐसा बिल्कुल नही सोच रहे थे कि समाज क्या सोचेगा।
दरअसल मां और बेटे दोनों प्रसन्न थे। माँ यह सोचकर गदगद हो रही थी कि आगे चलकर मेरा बेटा! अपने कौशल और बुद्धि के बल पर स्वयं को ऐसी जगह स्थापित कर लेगा, जहां से मेरी पहचान बदल ही जाएगी, लोग मुझे वैश्या नहीं कहेंगे। लोग मुझे एक विद्वान बेटे की मां कहेंगे।
उधर बेटे के मन में दूसरी बात चल रही थी।
बेटा सोच रहा था, क्या हुआ मेरी मां वैश्या है तो क्या। सब कुछ बदला जा सकता है लेकिन माँ तो नहीं बदली जा सकती है। बशर्ते मैं वैश्या मां के गर्भ से पैदा हूँ, लेकिन माँ तो सिर्फ और सिर्फ यही है न। मेरी मां मुझे बहुत प्यार करेगी मुझे अपने आंचल में छुपा कर दूध पिलाएगी, मुझे खूब पढ़ायेगी और मैं पढ़ लिख कर एक बड़े मुकाम को हासिल करूँगा और अपनी माँ का नाम रोशन करुंगा।
©® राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







