श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “हर मानव को खुद तपना है। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२७ ☆

☆ हर मानव को खुद तपना है…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

हर मानव को खुद तपना है।

सद्कर्मों को करना है।।

*

पंछी सभी सिखाते हमको।

पर फैला कर उड़ना है।।

*

साथ निभाती प्रकृति हमेशा ।

फल-फूलों सा खिलना है।।

*

वृक्ष हमें छाया-फल देते।

पर-उपकारी गहना है।।

*

सही धर्म सिखलाता हमको।

नहीं किसी से कुढ़ना है।।

*

ज्ञानीजन से शिक्षा पाकर।

अमृत कलश को चखना है।।

*

संतों का सानिध्य मिले तो।

बैर-भाव को तजना है।।

*

भ्रष्टाचार बढ़ा है यारो।

नाग-कालिया नथना है।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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