श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – || अभंग || ।)

?अभी अभी # १०४३⇒ आलेख – || अभंग || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो भजे हरि को सदा, वो ही परम पद पाएगा। हरि हजार हाथ वाला ही नहीं, हजार नाम वाला भी है। राम तेरे कितने नाम, विष्णु सहस्रनाम ! भक्त विभक्त भले ही नहीं होता हो, लेकिन अपने इष्ट के भक्ति भाव में अनुरक्त रहता है। वह जो भजता है, वह भजन हो जाता है।

भारत देश संतों की पावन भूमि है। संगत, संतन की कर ले। अयोध्या के मर्यादा पुरुषोत्तम राम हों, या फिर मथुरा, गोकुल, वृन्दावन के श्याम, सूर, तुलसी, और मीरा ही नहीं, गुजरात के नरसिंह भगत और महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, और समर्थ रामदास ने भी अपने भजनों से जन मानस को भक्ति रस में आंदोलित और आनंदित किया।।

कृष्ण भक्ति के कई आयाम हैं। वे ठाकुर जी भी हैं और मथुराधीश और द्वारकाधीश भी। वे ही राधाकृष्ण हैं और वे ही नाथद्वारा के श्रीनाथ जी भी। उनकी लीला अपरम्पार है। जगन्नाथ पुरी में अगर वे दाऊ बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं तो पंढरपुर में उनके साथ रुक्मिणी जी हैं। वृन्दावन के ही कृष्ण कन्हैया पंढरपुर में विट्ठल बन जाते हैं। यहां उनके साथ राधा रानी नहीं देवी रुक्मिणी विराजमान हैं।

जिस तरह अष्टछाप के संतों ने और रसखान और मीराबाई ने कृष्ण भक्ति में पदों की रचना की, उसी प्रकार महाराष्ट्र में संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, नामदेव और जनाबाई ने पंढरपुर के विठोबा की भक्ति में लीन हो, मराठी में अभंग की रचना की। वैष्णव संप्रदाय की तरह महाराष्ट्र में भी वारकरी संप्रदाय है जो अपने विट्ठल के दर्शनार्थ अपने अपने स्थानों से जय श्री हरि विट्ठल का जयघोष और पांडुरंग के अभंगों का कीर्तन करते हुए पैदल ही पंढरपुर की ओर प्रस्थान करते हैं।।

संत ज्ञानेश्वर महाराज ने ही वारकरी संप्रदाय की नींव डाली। वारकरी का अर्थ होता है, परिक्रमा करना। देवशयनी एकादशी को यहां लाखों भक्त विठोबा रुक्मिणी मंदिर की नाचते गाते परिक्रमा और पूजा अर्चना करते हैं। मीराबाई के पदों की ही तरह विठ्ठलाच्या गवळणी महाराष्ट्र के घर घर में गाई जाती है।

आप कोई भाषा जानें यह जरूरी नहीं, बस पंडित भीमसेन जोशी का अभंग माझे माहेर पंढरी एक बार सुन लें।

विसरू नको रे आई बापा ला और धरिला पंढरी चा चोर जैसे कई अभंग आपकी भक्ति भाव की चेतना को भंग नहीं होने देंगे।।

चैतन्य महाप्रभु की यह कीर्तन विधा ही आज महाराष्ट्र में अभंग और वारकरी संप्रदाय के रूप में फल फूल रही है।

आइए पंढरपुर चलें.. !!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈


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