स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  सूरज नहीं दिया।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९३ ☆

☆ –  सूरज नहीं दिया ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

कब्रगाहों में सुरक्षित रखा जा रहा है

एक जिन्दा और भरा-पूरा देश ।

शीऽऽशी, आहिस्ता बोलो,

शोर करोगे तो

कब्रिस्तान में मंडरा रहे गिद्ध

पहिन लेंगे बगुलों के वस्त्र

और देने लगेंगे

अजान…

हे भगवान !

शबनमी इलाके में

शोले चहलकदमी कर रहे हैं।

भेड़ियों की पदचापों से

गुलाबों के खेत-दर-खेत

उजड़ रहे हैं।

बारूद की गद्दीनशीनी पर

कर दिया गया है

अगरुगंध को निष्कासित,

और आँसुओं में डूबे दिल

हो रहे हैं

जड़ यंत्र द्वारा शासित ।

आखिर क्या है

इस मुश्किल का हल,

क्या कोई भी उपाय

नहीं हो सकता सफल ?

तो आओ,

हम सहयोगी बनें

और करें इस साजिश को विफल,

मगर, यह तब होगा

जबकि हिमालय

हिमालय रहे

न हो पाये विन्ध्याचल

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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