श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता आम आदमी की व्यथा…”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७२

☆ # “आम आदमी की व्यथा…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

एक आम आदमी

व्यवस्था से पीड़ित आदमी

अपनी बदहाली के लिए

अपनी बर्बादी के लिए

अपनी तंगहाली के लिए

अपनी जेब खाली के लिए

किससे शिकायत करे

किससे फरियाद करे

किसको अपना दुखड़ा बताए

किसको घायल तन का टुकड़ा दिखाएं

 

किसी के पास उसके लिए

वक्त नहीं है

हर कोई मदमस्त है

कानून भी कोई सख्त नहीं है

वही इसी परेशानी मे खड़ा है

अपनी बेबसी पर रोता पड़ा है

वक्त ने उसके जिस्म पर

एक पैदाइशी जख्म जड़ा है

उससे वह जीवन भर लड़ा है

आज वह थक हार कर

चुपचाप है

जीवन उसके लिए अभिशाप है

मुस्कुराना उसके लिए एक श्राप है

 

न्याय उससे कोसों दूर है

व्यवस्था अपने मद में चूर है

उसका पसीना अब सूखने लगा है

उसका अंग अंग अब दुखने लगा है

कोई मरहम लगाने वाला नहीं है

कोई वंचितों को जगाने वाला नहीं है

सारे लोग सामंतशाही के शिकारी है

वह शोषित आज नंगा भिखारी है

 

वह सोचता है

ऐसे जीने से क्या फायदा

हर किसी ने तोड़ा है

उससे किया हुआ वायदा

उसके लिए जीना दुश्वार है

ऐसा जीना तो वाकई धिक्कार है

परिवार की गरीबी और भूख

उसे अंदर ही अंदर तोड़ चुकी है

उसे एक भयानक निर्णय की तरफ

मोड़ चुकी है

या तो वह परिवार सहित

आत्महत्या कर लेगा

या फिर शस्त्र उठाकर

व्यवस्था की हत्या कर देगा

क्या उसके लिए यही न्याय होगा?

क्या उस गरीब के साथ यह अन्याय नहीं होगा?

 

अगर ऐसा ही है

तो हम कब जाएंगे?

पीड़ितों के लिए

कब न्याय मांगेगे?

या उनको उनके हाल पर छोड़कर

उनके जख्मों को रिसता छोड़कर

उनके जीवन में कटुता का जहर घोलकर

क्या हम रोज अपनी प्रशंसा के गीत गाएंगे ?

क्या हम उनकी बर्बादी का उत्सव जोर-शोर से मनाएंगे ? /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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