डॉ. हंसा दीप
संक्षिप्त परिचय
यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। लोक साहित्य पर पुस्तक, चार उपन्यास एवं आठ कहानी संग्रह प्रकाशित। गुजराती, मराठी, बांग्ला, अंग्रेजी, उर्दू, तमिल एवं पंजाबी में पुस्तकों व रचनाओं का अनुवाद। हंस, वनमाली, वागर्थ, भाषा, कथादेश, नया ज्ञानोदय, पाखी आदि कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार 2020 तथा राष्ट्रीय निर्मल वर्मा सम्मान।
☆ कथा कहानी ☆ ताजपोशी ☆ डॉ. हंसा दीप ☆
वह दिन उर्मि के लिए बहुत ही खास था।
सम्मान का दिन। पुरस्कृत होने का दिन। ताजपोशी का दिन।
पुरस्कार उसकी अपनी मेहनत का। पुरस्कार कलमकारी का। पुरस्कार उन अनगिनत पलों का, जिनमें डूबकर, रच-बस कर उसने लिखा था। उसे उस मंच पर जाना था, तालियों की गड़गड़ाहट के साथ। मंत्रियों और अफसरों के बीच। जीवन के सुंदरतम पलों को ले कर आएगा वह एक दिन और हमेशा के लिए माथे पर ताज की तरह सजा रहेगा।
फोटो के लिए उचित परिधान का चयन, चेहरे की झुर्रियों को खींचने वाले फेशियल-ब्लीच, ऐसे तमाम सौंदर्य प्रसाधनों से गुजरते हुए, उन प्रतीक्षित पलों को जीना था।
उसके अपने जीवन की यह महत उपलब्धि थी। अपनी मेज से सार्वजनिक मंच तक की दूरी उसने तय कर ली थी। उन पंक्तियों के सहारे, जो एकांत में जन्मी थीं। मन और कलम दोनों का तालमेल बैठाते हुए, कई-कई बार वाक्यों को तोड़ा-मरोड़ा और फिर से जोड़ा था। कभी उनसे जी भर कर प्यार किया था, तो कभी उनसे संघर्ष किया था। वे सारी कचोटती अनुभूतियाँ, जिन्हें कागज पर उतारने के लिए उसे जीते जी मरना पड़ा था, और फिर उन्हीं में पुन: जीवित भी होना पड़ा था। फिर से जीना भी उन्हीं शब्दों की ताकत थी, जिनमें उसने अपना मन उकेर कर रख दिया था।
आज वही शब्द उसकी अपनी पहचान बन चुके थे। वाहवाही और गौरव के वाहक। उसके अपने रचे शब्दों का संसार, एक लंबा सफर तय करके जैसे अपनी मंजिल को पा गया था। साहित्य जगत का यह प्रतिष्ठाजनक सम्मान हर किसी को नहीं मिलता, उसे मिला। इस साहित्यिक अलंकरण की ताजपोशी से उसका कद और भी ऊँचाइयों तक पहुँचेगा।
मगर, उर्मि सामान्य नहीं थी। भीतर की खुशी गायब थी। चेहरे पर तनाव-सा था। इसका सबसे बड़ा कारण था- उसका हमेशा से ही भीड़ से कतराना। लोगों से कन्नी काट लेना। किसी भी सभा में जाकर बोलना उसे अच्छा नहीं लगता था। अंतर्मुखी तो वह शुरू से थी ही, पर ज्यादा प्रशंसा उसे और भी नर्वस कर देती थी। समझ में नहीं आता कि इसका जवाब कैसे दिया जाए! इसीलिए वह इस सम्मान समारोह में जाने से भी बचना चाहती थी। इससे बचने का खयाल तो आया था, पूरे वेग से आया था। ठीक वैसे ही, जैसे स्वयं को ‘कमजोरों’ की प्रवक्ता मानने वाली नोबेल पुरस्कृत एल्फ़्रिड येलेनिक भी तो खुद पुरस्कार लेने नहीं गई थीं। इसलिए नहीं गई थीं क्योंकि उन्हें भीड़भाड़ वाली जगहों से भय लगता था। उन्हें भीड़ का फ़ोबिया था। टीवी एवं मीडिया से भी दूर रहती थीं।
क्यों न, वह स्वयं भी ऐसा ही कुछ करे! खयाल अच्छा था। बहुत अच्छा था। दिल को सुकून देने वाला। घर वालों से इस बात का जिक्र किया, तो सबने उसके इस निराशात्मक रवैये के लिए जी भर कर लताड़ा। तंज पर तंज करते रहे- “दिमाग तो खराब नहीं हो गया तुम्हारा!”
“तुम्हारा पुरस्कार नोबेल पुरस्कार नहीं है, न भी जाओगी तो किसी किताब में लिखा नहीं जाएगा।”
“बेहतर है कि जाकर ले लो। जिंदगी ऐसा मौका फिर न देगी।”
“बाद में पछताती रह जाओगी।”
“लोग तरसते हैं ऐसे पलों के लिए, और तुम भागना चाहती हो।”
जितनी तेजी से विचार आया था, उतनी ही तेजी से उसे बाहर का रास्ता देखना पड़ा। सच तो कहा घर वालों ने- वह नोबेल था। लोग नोबेल विजेता को यूँ भी याद रखेंगे ही। कहाँ नोबेल और कहाँ उसका पुरस्कार! दोनों में जमीन आसमान का अंतर!
बेचारी उर्मि! मरती क्या न करती! जाने के अलावा कोई चारा न था।
वह रात कुछ ऐसी थी, जैसे कत्ल की रात हो। सारी तैयारियों के बावजूद करवटें बदलती रही। तनाव और घबराहट के कारण पेट में गुड़गुड़ाहट शुरू हो गई। सोचा, कुछ खा लिया जाए, तो शायद नींद आ जाए। देर से खाना और वह भी पेट भर कर खाना, उलटा पड़ गया। फैक्ट्री चालू हो गई, यानी लूज़ मोशन्स।
एक के बाद एक, लगातार दौरे, थमने का नाम ही नहीं लेते। वापस आकर लेटने की मोहलत भी नसीब नहीं होती और फिर वही वॉशरूम की ओर भागना। देखते-देखते रात ढलकर सुबह के चार बजा गई थी। पानी का एक घूँट भी जैसे शरीर ठुकरा देता। डायरिया, अपने चरम पर था। इस समय कहीं से भी, कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं थी।
अब उसके पास पानी पीना भी बंद कर देने के अलावा कोई उपाय नहीं था। फेशियल-मसाज से जो चेहरा खिला-खिला लग रहा था, अब वह पिचक गया था। लेकिन अब उसे इन सबकी चिंता नहीं थी। चिंता थी, तो सुबह दस बजे शुरू होने वाले कार्यक्रम में टिक कर बैठने की। ऐसा न हो कि बार-बार उठकर जाना पड़ जाए।
अब पेट में न अन्न था, न पानी। सब कुछ निकल चुका था और शरीर पस्त हो चुका था। खड़े रहने की हिम्मत पुरस्कार की ताकत से मिल रही थी।
आखिर वे पल आ ही गए। उसकी मेहनत की ताजपोशी पूरे सम्मान के साथ हुई। मंच का कार्यक्रम खत्म हुआ। तालियों की गूँज के बीच, फूलों के गुलदस्ते, शील्ड और शॉल थामे वह जैसे ही मंच से उतरी, कैमरों ने उसका पीछा करना शुरू कर दिया। एक के बाद एक रिपोर्टर उसे घेरते चले गए। साक्षात्कार पर साक्षात्कार। हर बार वही सवाल, वही जवाब। उसका गला बैठ चुका था, पर वहाँ सारे माइक आगे बढ़ाने वाले थे। पानी देने वाला कोई नहीं था।
कैमरों की चमक का सामना करना उसके लिए आसान नहीं था। हालाँकि, गौर से सोचें तो इतना मुश्किल भी नहीं होना चाहिए था। फिर भी, बार-बार दोहराए जाते सवालों के वही जवाब, न जाने क्यों उसे भीतर से विचलित कर रहे थे।
अतीत में घटी हर बात कैमरे के सामने सहजता से याद नहीं आ रही थी। ऊपर से कैमरों की तीखी लाइटें और पसीने से बचाने के लिए लगे पंखों की तेज हवा। बाल इस कदर शैतान हो गए थे, जैसे उन पर फुर्री उड़ा दी गई हो। जरा सी हवा लगते ही बालों ने अनुशासनहीनता की सारी हदें पार कर दी थीं।
इसके बाद फोटोग्राफर की भीड़ ने उसे घेर लिया। अपने-अपने लिए गए फोटो थमाने के लिए। हर किसी का दावा था कि उसी के पास सबसे अच्छे फोटो हैं। बस, पैसे देने होंगे। वह आखिरी पल तक सबसे पीछा छुड़ाकर इस कदर भागी कि कोई उसे देख न पाए। तब उसे इस बात का अहसास हुआ कि बड़े स्टार, राजनैतिक हस्तियों का पत्रकारों पर गुस्सा करना कितना जायज होता है। अचानक कई सिनेमाई हस्तियों के चेहरे उसके सामने उभर आए। वही चेहरे, जो पीछे आते कैमरों को फटकारते हुए जल्दी से भीतर घुस जाते थे। आम जनता को लगता कि ये सेलिब्रिटी कितने अकड़ते हैं। किन्तु सचमुच, उनके जीवन का एक दिन जीना भी कितना मुश्किलों से भरा था।
एक ही दिन की सेलिब्रिटी जिंदगी में उसका अपना चैन कहीं खो गया था। एक दिन की ताजपोशी बहुत थी, जीवन में भी, यादों में भी। वह वहाँ से भाग जाना चाहती थी। दूर, बहुत दूर। इतनी दूर कि फिर कभी ये कैमरे उसके पीछे न आएँ, उसे कैद करने की कोशिश न करें। उसके अनचाहे गुस्से को, चिढ़ को, घबराहट को, निराशा को और न बढ़ाएँ, क्योंकि लगातार भूखे रहने से आई कमजोरी ने उसका हाल बेहाल कर दिया था।
खैर, वह दिन भी निकल गया। घर वापसी हो गई। घर लौटते ही परिवार वालों के सवाल शुरू हो गए– “बहुत खुश हो?”
“बेहद उत्साहित हो?”
“राहत महसूस कर रही हो?”
वह हर सवाल पर बस हल्के से मुस्कुराती, और शांत स्वर में हर सवाल का एक ही जवाब देती रही, “मैं इस समय कुछ भी महसूस नहीं कर रही, सिर्फ एक खालीपन है।”
वह जल्द से जल्द उन पलों से उबरना चाहती थी। अचानक आए इस भावनात्मक उतार-चढ़ाव का सामना करना उसके लिए आसान नहीं था। आने वाले कई दिन उसे एक अजीब-सी स्थिति में डाल गए। ऐसा लगता था जैसे समय आगे तो बढ़ रहा था, किन्तु भीतर कहीं कुछ ठहर-सा गया था। कई दिनों तक एक अजीब-सी रिक्तता छायी रही। ऐसी, जहाँ न शब्द थे, न भाव। वह खुद से ही कट-सी गई थी।
सबसे ज्यादा चोट उसे तब लगी, जब बरसों पुराने मित्र भी पहले की तरह बात नहीं कर रहे थे। जैसे अचानक ही इस सम्मान ने रिश्तों की डोर को ढीला कर दिया हो। उनकी आवाज में अब वह अपनापन नहीं रहा था। उनके शब्दों में घुली दूरियाँ कानों को असहनीय हो रही थी। जो हँसी, ठहाके, बेफिक्र होकर आपस में साझा होते थे, अब औपचारिक मुस्कानों तक सीमित हो गए थे। मानो इस एक उपलब्धि ने अनजाने ही मित्रों के बीच दीवार खड़ी कर दी हो।
हैरानी इस बात की थी कि अब वह कलम की ओर देखती तक नहीं थी। ऐसा लगने लगा कि बहुत हो गया लेखन।
दिमाग कह उठता- “अब क्यों?”
दिल भी साथ देता, “अब क्या लिखना, और क्यों लिखना!”
धीरे-धीरे, दिनों की खामोशी हफ्तों में, महीनों में बदल गई। लोग, कैमरे, तालियाँ सब कुछ कहीं दूर खोते गए। फिर भी, उसके भीतर का सन्नाटा अडिग था, वज्र-सा अटल। जड़वत वहीं जमा रहा। वह अपनी सामान्य जिंदगी में लौटने को व्याकुल थी, अपनी मेज, कलम, शब्द और अपनी दुनिया की ओर। लौटने का रास्ता मिलने के बजाय और भटकाव की ओर धकेल रहा था।
बेचैनी भरी एक और रात किसी लंबे रतजगे-सी करवटों में कट गई। सुबह खिड़की से छनकर आती धूप चेहरे पर पड़ी, तो अनायास उठकर वह आईने के सामने जा खड़ी हुई। खुद को इतने गौर से देखा कि थका-हारा-सा प्रतिबिंब भी बोल उठे, राख में दबी धीमी चिंगारी की तरह। बगैर पलकें झपकाए, बेचैन आँखें कुछ खोज रही थीं, ऐसे जैसे उसे पाए बगैर उन्हें बंद होना मंजूर ही न हो।
खिड़की के बाहर फेंस के छोर पर, कचरे की सड़ी हुई परतों के बीच भी जीवन ने अपनी जिद नहीं छोड़ी थी, प्रकृति, क्षय और पुनर्जन्म सब एक साथ उपस्थित थे। छोटे-छोटे नाजुक-से फूल काँपते हुए खिले थे, मानो सूरज की पहली छुअन के साथ ही अपनी पूरी उम्र जी लेना चाहते हों। एक बित्ता-सा हरा टमाटर पत्तों के बीच अपनी उपस्थिति का संकेत दे रहा था। अभी वह बड़ा होगा, धीरे-धीरे लाल मुकुट पहनेगा, किसी की थाली में सजेगा, या फिर यहीं गिरकर दोबारा उगने की कोशिश करेगा। मिट्टी से उपजा, मिट्टी में बिखरा, ताकि समय फिर से गढ़ सके।
प्रकृति के सम्मान में अनायास ही पलकें भारी होकर झुक गईं। न कोई शोर, न कोई पदचाप, शायद उसी क्षण वह अपने भीतर लौटने लगी। कलम लिखने को आतुर थी- हर ताजपोशी का एक अंत होता है।
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© डॉ. हंसा दीप
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





