सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ निरीह जीव की पिटाई… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

(हाफ लाइनर)

आखिर पीटा भी तो किसे, निरीह जीव कवि को और वो भी कहाँ डबरा में।

खबर पढ़ते ही लतीफा याद आ गया। मकान मालिक ने किराएदार को इसलिए निकाल दिया कि जब वो रात में लिखता है तो उसकी पेन किर्र किर्र करती है। इसलिए मालिक की नींद में खलल पड़ता है।

 लेखक / कवि होना जैसे गुनाह हो गया। माँ बाप की नज़र में नकारा और लोग— लोगों का काम है कहना— जो कुछ नहीं बन सकता वह नेता या तो कवि बन जाता है।

प्रमाण बिखरे पड़े हैं। पुरातत्वविदों को तलब करने की जरूरत नहीं है।

अब कोई दीदे होकर भी न दिखने का ढोंग करे उसका तो परमात्मा भी कुछ नहीं कर सकता।

 एक कविता ही तो सुनाई बेचारे ने। इतनी सी बात पर उसके कपड़े फाड़ डाले। दयनीय दशा में पहुँचाया यहां तक तो ठीक है फिर फोटो भी खींच ली(उसने कब कहा था– खींच्च मेरी फोटो—)

फोटो खींची यहां तक भी ठीक है फिर उसे अखबार में छपवा भी दिया। घोर बेइज्जती।

अखबार की बात समझ में आती है, सोशल मीडिया पर भी डाल दिया। इतना जघन्य अपमान। कवि को चाहिए वह एक करोड़ की मानहानि का दावा करे। इससे कम का तो कतई नहीं। समूची कवि बिरादरी की इज्जत का सवाल है।

या फिर सारे कवि मिलकर इस घनघोर अपमान के विरोध में मीम बनाएं, स्लोगन लिखें, जेन जी की तरह विरोधात्मक नृत्य करें या पैरोडी गाएं।

कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा। अत्याचार सहने की भी सीमा होती है।

मारनेवाले जितना मार खानेवाला भी अपराधी है।

काश कवियों को इतनी सी बात समझ में आ जाती।

हर घटना के दो पहलू होते हैं। दूसरा पहलू न पूछिए— जो भी पढ़ रहा है, मंद मंद मुस्कुरा रहा है। इतना आनंद तो शायद ही कभी नसीब हो। इतना बेचैन है देश पर इस दशा में भी गदगदायमान हो रहा है।

ऐसे तो कारण अकारण कई पीटते /पिटते/ पिटवाते हैं। किसी किसी के भाग्य में ही होता है स्वयं दुःख सहकर दूसरों को आनंद प्रदान करना। कवि के सामाजिक सरोकारों पर गौर फरमाने की जरूरत है।

उस कवि पर तरस खाने की बजाय उसके लिये पुरस्कार की व्यवस्था करनी चाहिए। इस नेक काम के लिये चंदा आसानी से मिल जाएगा।

अगर आयोजक चंदा चुराएगा तो भी कितना।

दो सौ करोड़ तो नहीं ना।

ऐसे तो बेवजह बेसबब सत्कार के कारनामे नित्य होते हैं। यहां तो कवि की बेइज्जती का सवाल है। कोई गा के कविता पढ़ता है कोई दहाड़कर। कोई अभिनय के साथ। उसे तो याद भी रखना पड़ता है। इतने कमसिन जीव को कोई टेलीप्राॅम्प्टर तो देगा नहीं। न पुष्पवर्षा करेगा।

चिंघाड़ना कवि का संवैधानिक अधिकार है। इसे चुनौती देना ठीक नहीं।

परिसर में रहनेवालों को नींद नहीं आती। कवि की दहाड़ से नींद उड़ जाती है। हैरानी है जो गहरी नींद में सोये हैं उनपर किसी कवि के गरजने बरसने का असर होने से रहा। होता ही नहीं।

भविष्य में कवि जैसे हानिरहित प्राणी (प्राणधारक) को हानि न पहुँचाई जाए अन्यथा ——-सौ करोड़ याद रखना। ।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted