श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” ।)
☆ शेष कुशल # ६५ ☆.☆ व्यंग्य – “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” – शांतिलाल जैन ☆
उधर सात समंदर पार निज़ाम-ए-अमेरिका अपनी कामकाज की मेज़ पर लिखवा कर रखते हैं – ‘बक स्टॉप्स हियर’. इधर आर्यावर्त में ‘बक स्टॉप्स नो व्हेयर’. अंग्रेजी का बक श्रीमान्, आला हाकिम से लेकर अदने से मुलाज़िम तक कोई उसे अपनी डेस्क पर ठहरने नहीं देता. पास देने में सब प्रवीण. हॉकी फुटबाल में होते तो खूबसूरत पास दे रहे होते. बहरहाल, मैंने बक को जबरन रोककर पूछा – यार ये परीक्षाओं के पेपर बार बार लीक हो रहे हैं – तुम किसी की डेस्क पर जाकर तो रुकोगे?
उसने कहा – ठहरेंगे तो मारे जाएँगे शांतिबाबू. हमें जहाँ ठहरना चाहिए वहाँ शिकारी बैठे होते हैं. समय आने पर जो आदमखोर हो जाने का भी दम रखते हैं. मुझ निरीह गरीब प्राणी को क्या ही छोड़ेंगे? आदम जो कभी किसान के रूप में मरता है कभी छात्र के तौर पर, कभी महिला पहलवानों के तौर पर तो कभी रिटायर्ड सैनिक के तौर पर. हमें ठहरना तो वहीं चाहिए जिनके कारण वे मरते हैं. मगर, क्या मजाल है कि हाकिम की नाक पर मक्खी और कामकाज की डेस्क पर कोई बक ठहर जाए. ठहरने का तो इन दिनों हमने सोचना ही बंद कर दिया है.
‘कभी, कहीं तो ठहरे होगे तुम?’ – मैंने पूछा.
‘लाल बहादुर शास्त्री के समय ठहरे थे हम. ट्रेन अरियालुर में दुर्घटनाग्रस्त हुई और हम दिल्ली में रेलमंत्री की डेस्क पर जा कर ठहर गए. अब हम कहीं नहीं ठहरते. आर्यावर्त के ओहदेदार ‘पास द बक’ में निपुण जो हो गए हैं. जो जितना बड़ा ओहदेदार पास देने की कला में वो उतना ही माहिर.’
आर्यावर्त का मामला श्रीमान्, मैं भी क्या ही कहता उसे. उसी ने कहना जारी रखा – ‘यहाँ हर संकट के साथ तीन चीज़ें तत्काल पहुँचती हैं — कैमरा, बयान और उच्च स्तरीय जांच समिति. समिति जवाबदेही तय करेगी. रियाया उम्मीदें पाल लेती है, समिति के निष्कर्ष आएँगे, जिम्मेदार लोग दोषी ठहराए जाएँगे, समिति कहेगी मुझसे बक, यू स्टॉप हियर. मगर ऐसा होता नहीं. वो क्या है कि समिति उच्च स्तरीय होती है. रियाया निच्च. उच्च भी इतनी कि सीढ़ी आप चढ़ नहीं पाएँगे और लिफ्ट आपको कोई देगा नहीं. गर्दन दुखने लगती है तो जनता उच्च स्तर पर देखना ही बंद कर देती है. समिति उच्च स्तर पर जाँच करती है, निष्कर्ष हैं कि नीचे तक आ नहीं पाते.’
पिछले दिनों एक पुल टूट गया, सैकड़ों की संख्या में लोग मर गए. मैंने बक से कहा – ‘सेतु निगम के अधकारियों से लेकर लोक निर्माण विभाग के वज़ीर तक किसी की डेस्क पर तो तुम्हें रुकना ही पड़ेगा?’
उसने कहा – ‘बहुत भोले हैं आप शांतिबाबू, बल्कि बेवकूफ़ हैं. गिरनेवाला यह पहला पुल नहीं है. न ओहदेदार नए हैं, न मेरे जैसा बक ही नया है. कुछ क्लासिक पास देखिएगा – निर्माण एजेंसी दोषी है. एजेंसी कहेगी तकनीकी स्वीकृति प्रशासन ने दी थी. प्रशासन कहेगा बजट सीमित था. वित्त विभाग कहेगा वैश्विक परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं. पुल कमज़ोर था, चेतावनी लिखी थी फिर भी बड़ी संख्या में लोग पुल पर आ गए.’ कुछ हुआ कि मरहूम मासूमों को याद करते करते गला भर आया बक का. बोला – ‘कभी किसी रसूखदार को टूटते पुल पर मरते हुए देखा है ? वे पुलों को न पैदल पार करते हैं, न टूटने से मरते हैं.’
बोला – ‘इस तरह पास दिए जाने से बेहतर है हाराकिरी कर ली जाए. यूँ भी सफलता के सौ बाप होते हैं, विफलता अनाथ. सड़क समय पर बन जाए तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. सड़क बरसात में बह जाए तो यह अप्रत्याशित वर्षा का परिणाम है. महँगाई घटे तो नीति सफल है, बढ़े तो अंतरराष्ट्रीय कारण हैं. परीक्षा अच्छे से हो जाए तो प्रशासन दक्ष है, प्रश्नपत्र लीक हो जाए तो कुछ शरारती तत्व सक्रिय थे. निज़ाम का फण्डा क्लियर है, काम अच्छा हुआ तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. खराब हुआ तो यह मौसम के कारण हुआ. ईरान युद्ध के कारण हुआ. तकनीकी खामी के चलते हुआ. स्थानीय प्रशासन दोषी है. विपक्ष के समय भी हुआ. आला हाकिम का कोई कसूर नहीं.’
‘आपके आर्यावर्त की रियाया शांतिबाबू, एकदम उदारमना!! हर बार भरोसा कर लेती है बक कभी तो किसी विभाग में किसी की डेस्क पर जा कर ठहरेगा. उधर निज़ाम भी उतने ही मुतमइन हैं – अगली घटना घटने तक रियाया पिछली घटना भूल जाएगी. जब कोई नहीं मिलेगा तो नेहरू है ना! बक स्टॉप्स देयर.’ – उसने धीमे से कान में कहा – ‘बौने कद के ओहदेदार और कामकाज की ऊँची मेज़ें, तो कैसे लिखवाईएगा – ‘बक स्टॉप्स हियर’. फिर वह चला गया.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
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