श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “ओ! बादल” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १५७ ☆
☆ ओ! बादल ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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घिरो नहीं
तुम गिरो ओ!बादल
धरती प्यासी।
अभी-अभी
बस एक छटा
दिखलाकर रूठे
घुमड़े जब
घुँघराले बन
पर निकले झूठे
बनो बूँद
फिर झरो ओ!बादल
नदिया प्यासी।
खड़ी लहर
पंथ निहारे
घाट पड़े सूने
नाव बँधी
रेतीले मन
दुख लगते दूने
पीर कृषक
की हरो ओ!बादल
खेती प्यासी।
दुखिया जग
छप्पर छानी
प्यास नहीं बुझती
आँगन में
है धूप खिली
चिड़िया तन चुगती
अब तो तुम
कुछ करो ओ! बादल
माटी प्यासी।
***
© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
१२.७.२६
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