श्री दिवाकर बुरसे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ एक वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना ☆ श्री दिवाकर बुरसे

ओम् आ ब्रह्मन् ब्राम्हणो ब्रम्हवर्चसी जायताम्।

sस्मिन् राष्ट्रे राजन्य इषव्यः।

शूरो महारथो जायताम्।

दोग्ध्री धेनुर्वोढाsनङ्वानाशुः सप्तिः।

पुरान्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः।

सभेयो युवाsस्य यजमानस्य वीरो जायताम्।

निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु, फलिन्यो न औषधयः पचन्ता योगक्षेमो नः कल्पताम्।।

समानि व आकूतिः समाना ह्रदयानि वः।

समानवस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।

सर्वेsत्र सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पष्यंतु मा कश्चित दुखःमाप्नुयात्।

*

ओम् शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।


मराठी भावानुवाद

हे जगदीशा, या राष्ट्राला ब्रह्म जाणते ब्राह्मण दे

शूर, धीर, गंभीर, प्रतापी महारथी लढवैय्येे दे।।१।।

*

दुभत्या गायी, पुष्ट पशुधने, समीरस्पर्धी हयदळ दे

सुंदर, सात्विक, सुबुद्ध, सुदृढ माता, वनिता, दुहिता दे।।२।।

*

युवासंघ बलशाली आणि सभेस सभ्य सभासद दे

पाउस पडु दे सुयोग्य समयी, रसरशीतसे वनधन दे।।३।।

*

स्वप्ने, ध्येये, मने आमुची एक असू दे सदाकदा

सुखी, निरोगी, मंगल जीवन सकला दे रे भगवंता।।४।।

ओम् शांतिः शांतिः शांतिः।

🙏🏻

© श्री दिवाकर बुरसे

पुणे

संपर्कः ९२८४३००१२५, ९५५२६२९२४५

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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