श्री राजेन्द्र निगम
(ई-अभिव्यक्ति में श्री राजेंद्र निगम जी का स्वागत। आपने बैंक ऑफ महाराष्ट्र में प्रबंधक के रूप में सेवाएँ देकर अगस्त 2002 में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। उसके बाद लेखन के अतिरिक्त गुजराती से हिंदी व अँग्रेजी से हिन्दी के अनुवाद कार्य में प्रवृत्त हैं। विभिन्न लेखकों व विषयों का आपके द्वारा अनूदित 14 पुस्तकें प्रकाशित हैं। गुजराती से हिंदी में आपके द्वारा कई कहानियाँ देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आपके लेखों का गुजराती व उड़िया में अनुवाद हुआ है। आज प्रस्तुत है आपके द्वारा सुश्री गिरिमा घारेखान जी की कथा का हिन्दी भावानुवाद “औरत”।)
☆ कथा-कहानी – औरत – भाग – १ – गुजराती लेखिका – सुश्री गिरिमा घारेखान ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम ☆
गहरे रंग के दुपट्टे से बालों को ढंक कर अपने लोगों पर हुक्म चलानेवाली समीरा के गाल पर जब उसके सुनहरी बाल आ जाते, तब वह उन्हें एकटक देखता रहता | इस सुरमई आँखोंवाली मालकिन उसे उसके गाँव में बैठी एक प्रियजन की याद दिला देती | – अब इसकेआगे —-
सुश्री गिरिमा घारेखान
एक गुरुवार राशिद नहीं आया | सुबह से राह देख रही समीरा दोपहर तक बैचैन हो गई | उसने राशिद का फोन मिलाया |
‘आपकी राह देख रही हूँ |’
‘अरे जानेमन, कुछ काम है यहाँ |’
राशिद के इस ‘जानेमन’ संबोधन में समीरा को आज जान नहीं लगी | परंतु बहुत अधिक पूछताछ किए बगैर उसने इतना ही पूछा,
‘अगले गुरुवार को तो आ रहे हो न ?’
‘इंशाअल्लाह’ कह कर राशिद ने फोन रख दिया |
उसके बाद प्रत्येक गुरुवार को सुबह समीरा खिड़की के पास खड़ी हो जाती और राशिद का इंतजार करती रहती और नजर हमेशा बाहर के खालीपन से टकरा कर वापिस लौट आती | एक दिन उसने माली को बाहर एक बड़े वृक्ष को उखाड़ते हुए देखा | उसने कारण पूछा तो जवाब मिला, ‘मालकिन, यहाँ तो ऐसे तैयार बड़े पेड़ लगाए जाते हैं | कुछ लग जाते हैं और कुछ नहीं लगते हैं | यह सूख गया है, इसलिए उखाड़ रहा हूँ |’
उसके बाद समीरा जब भी दर्पण में देखती, तब उसे एक सूखने वाला वृक्ष दिखाई देता | उसकी बेचैनी दिनोदिन बढ़ती जा रही थी | राशिद की रुकी हुई मुलाकातें, आवाज में बेरुखी और रख दिए जाते टेलीफोन उसे क्या संकेत दे रहे थे ? अब उसे मखमली कारपेट, फव्वारे का पानी और बगीचे के फूल आनंद नहीं देते थे | अब अन्धकार से खुश्बू और दिन से उजाला उड़ गया था |
महीने से भी अधिक समय हो गया था | समीरा को राशिद के व्यवहार में आए इस अचानक बदलाव का कारण समझ में नहीं आया था | राशिद को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी? उसे मात्र काम करने के लिए यहाँ लाया गया था ? ‘हिंदुस्तानी होशियार लड़की’ थी, इस लिए ? अकेलापन उसे खाए जा रहा था | पीली खजूर भी पक कर अब सुर्ख लाल हो गई थी | कुछ दिनों में यह काम भी बंद हो जाएगा | फिर तो बात करने के लिए सईद का साथ भी नहीं मिलेगा |
समीरा का मन बारबार उड़ कर उसके गाँव पहुँच जाता | वहाँ उस छोटे से घर में कितना सुकून था ! घर व बाहर पूरे दिन किसी चिड़िया की तरह चाँव-चाँव कर उड़ती रहनेवाली वह यहाँ क्या बन गई थी- एक मसाला भरी मोरनी जो कमरे की शोभा बढ़ाती थी ? वह सोचती कि उसकी अम्मी ने उसे इस सुख के कुँए में क्यों धकेल दिया ? अम्मी ने उसकी चमकती दीवारों को देखा. लेकिन उसे यह मालूम नहीं हुआ कि उन दीवारों पर भावनाओं की आर्द्रता बिल्कुल नहीं है | इन चिकनी दीवारोंवाले कुएँ में सिर ऊँचा रख कर बैठी समीरा प्रत्येक गुरुवार की सुबह राशिद के आने की राह देखती और दोपहर के बाद अगले गुरुवार की राह देखती |
अंत में उसके दुःख के बादलों को चीरता हुआ एक गुरुवार आया | राशिद जल्दी सवेरे ही आ गया | उसके चेहरे पर समुद्र की लहरों की तरह आनंद उछल रहा था | उसके ड्रायवर ने गाड़ी में से मिठाई के पैकेट निकाले और बगीचे में काम करनेवाले लोगों को बाँटना शुरू किया | सभी लोग मालिक को ‘मबरुक, मबरुक’ कह रहे थे | राशीद तो मानो दौड़ता हुआ समीरा के पास आया और उसे उठा लिया | समीरा के मन के रेगिस्तान में बरसात हुई | बहुत दिन के बाद मिले इस खाविंद से लिपटकर वह बोली, ‘इतनी ख़ुशी ! क्या धंधे में बहुत तरक्की हुई ?’ राशिद ने समीरा के मुँह को अपने दोनों हाथों के बीच लिया. ‘अरे, जिंदगी में तरक्की मिल गई | मैं अब्बा बन गया | बेटा हुआ है, बेटा |’
समीरा के कान से मानो बहता हुआ तेज़ाब उसके पूरे शरीर में फ़ैल गया | उसने राशिद को धक्का दे कर अपने से दूर किया | अब भी उसे अपने कानो पर उसे विश्वास नहीं हो रहा था, ‘आ…प आप अब्बा ? अर्थात् क्या आपकी दूसरी पत्नी…?’
अब राशिद कुछ बेशर्मी के साथ हँसा, ‘अभी ऐसे सवाल से मेरा मूड खराब मत करो | बगैर बीबी के मैं मस्कत में रहूँगा कैसे ? मैं मर्द हूँ मर्द, अरब मर्द, समझीं ? मर्द को तो औरत चाहिए ही चाहिए, हर जगह|’
समीरा का कलेजा फट गया | बोलने को कुछ रहा नहीं | अरब देश में शादी कर रोबभरी साहबी के साथ बख्शीश की तरह मिलनेवाली इस कटु वास्तविकता को वह अच्छी तरह समझ गई थी | परंतु अब क्या हो सकता है ? धागा ही टाँके को तोड़ दे, तो फिर सिलाई कैसे हो?
राशिद ने दोपहर में खजूर का सब हिसाब-किताब देखा और शाम को ही लौट गया | खिड़की के पास खड़ी होकर समीरा इस उत्फुल्ल अरब मर्द को जाते हुए देखती रही | सूरज के ढलने से अब बाहर अँधेरा छा गया था | समीरा ने खिड़की से इस अन्धकार पर थूका, कमरे में आई और सात बल्बवाले झूमर की लाईट चालू की | कमरा जगमगाने लगा |
समीरा ने मोबाईल हाथ में लिया और सईद को फोन किया | कुछ ही देर में आसमान से निकलनेवाले आफताब की तरह सईद आ गया | उसे देखकर समीरा को लगा, मानो उसे कोई आत्मीय मिल गया हो और तब केरल की बरसात की तरह उसकी आँखे बहने लगी | उसने रोते-रोते कहा. ‘सईद, तुमने भी मुझे नहीं बताया, तुमने भी ?’
सईद सब स्थिति समझ गया और नजरे झुका कर बोला, ‘आप बहुत मासूम हैं | यह अरब देश है, यहाँ तो मर्द जहाँ भी रहे, वहाँ उसे एक बीबी तो चाहिए ही |’
समीरा चुपचाप सुनती रही | सईद की बातों से उसकी मासूमियत क्षीण होती रही – ‘अब मालिक की पहली ओमानी बीबी तो बच्चे में व्यस्त हो जाएगी | सुना है, अब मालिक पाकिस्तान जाएँगे | शादी कर आएँगे और उस लड़की को मस्कत में रखेंगे…|’
पत्थर बनी समीरा कण-कण में बिखर गई | उन कणों को एकत्रित करने में उसे कुछ वक्त लगा | फिर सईद की आँखों में अपनी सजल आँखें डालकर वह बोली, ‘तुम्हारे मालिक ने पैसों के जोर पर मेरी जिंदगी बर्बाद की है | सईद, क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकती हूँ ? मुझे यहाँ के कायदे-क़ानून समझाओगे ?’
सईद को समीरा की आँखों में दिखीं चौवीस घंटे उसका पीछा करती केरल के उसके घर में बैठी बहन की दो आँखें | उसने स्वीकृति में सिर हिला दिया | उसे लगा कि खुदा ने उस पर मेहरबान होकर किसी का कर्ज चुकाने का मौका दिया है |
लगभग डेढ़ महीने के बाद राशिद आया | नए कपड़े और अलंकारों से सजी किसी दुल्हन की तरह समीरा उससे लिपट गई- कोई शिकायत नहीं और कोई गुस्सा नहीं | राशिद मन ही मन हँसा, ‘औरत को कपड़े-गहने मिल जाए, उसे फिर कोई फर्क नहीं पड़ता है |’
शब्दों में अपने समग्र स्त्रीत्व को पिघालकर समीरा ने राशिद से कहा: ‘दिलबर, आप बहुत लंबे समय से नहीं आते हैं, इसलिए बहुत परेशानी रहती है |”
‘क्या बेगम ? आप बोलिए, आपकी सभी समस्याएँ दूर कर देंगे |’
राशिद को लगा कि वह किसी नए गहने की माँग करेगी |
‘आपके न आने से हमारे घर व खजूर के धंधे के लोगों की तनख्वाह समय पर नहीं होती है अतः वे काम ठीक से नहीं करते हैं | देखिए, खजूर उतारने के पहले ही कितनी पक गई ?’
‘बात तो सही है |’
‘अगर आप मंजूरी दें तो मुझे इस कामकाज को कुछ बढ़ाना है | पकी हुई खजूर में से गुठली निकालकर उसमें बादाम भर कर हम उसे परदेश भेज सकते हैं |’
राशिद को इस हिंदुस्तानी लड़की के दिमाग पर गर्व हुआ |
‘मेरे सरताज, आप मुझे यहाँ की पावर ऑफ अटार्नी दे दें, फिर आप कितने भी लंबे वक्त तक यदि न भी आएँ, तो कुछ दिक्कत नहीं |’ राशिद के होंठों पर अपनी उंगलियाँ घुमाते हुए समीरा बोली, ‘इस जानु के बगैर मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है. लेकिन उसकी औरत हूँ| मुझे मेरे खाविंद की खुशी भी देखना है न ?’
हाथों में पहनी चूड़ियों को खनकाते-खनकाते समीरा ने एक बादाम भरी खजूर राशिद के मुँह में रखी और उस नर्म खजूर के साथ उसकी बात भी राशिद के गले उतर गई | इतनी अवधि तक इस औरत ने इस कारोबार को बहुत सुंदर ढंग से संभाला था, इसलिये उसकी कुशलता या नियत पर भरोसा न करें, उसका कोई कारण ही नहीं था | यदि वह इसको पावर ऑफ अटार्नी दे दे, तो वह पाकिस्तान कि जिस खिली हुई कली को लानेवाला है, उसके साथ वह मस्कत में आराम से रह सकता है |
हमेशा की तरह राशिद शनिवार को चला गया और मंगलवार शाम को उसका ड्रायवर आया और सरियात की अदालत के दस्तावेज दे गया | अब राशिद की सोहार की सभी संपत्ति की पावर ऑफ अटार्नी समीरा के पास थी | दस्तावेज को हाथ में ले कर मुस्कराती हुई समीरा मन में बोली : ‘इस मर्द को पहली बार कोई औरत मिली है |’
सूर्यास्त हुआ और आकाश में चन्द्रमा उभरा | समीरा ने मोबाईल हाथ में लिया और सईद को फोन किया, ‘काम हो गया है | सेवइयाँ बना रही हूँ, आनंद से यह ख़ुशी मनाएँगे न ?’
दूर किसी मस्जिद में मगरीब की नमाज की अजान हुई | समीरा ने दुपट्टा सिर पर ओढ़ा और खुदा का शुक्रिया कहने के लिए उसने नमाज पढ़ना शुरू किया |
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मूल गुजराती कहानीकार – सुश्री गिरिमा घारेखान
संपर्क – 10, ईशान बंगलोज, सुरधारा- सत्ताधार मार्ग, थलतेज, अहमदाबाद- 380054 मो. 8980205909.
हिंदी भावानुवाद – श्री राजेन्द्र निगम,
संपर्क – 10-11 श्री नारायण पैलेस, शेल पेट्रोल पंप के पास, झायडस हास्पिटल रोड, थलतेज, अहमदाबाद -380059 मो. 9374978556
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





