श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मलाई-नामा…“।)
अभी अभी # १०७३ ⇒ आलेख – मलाई-नामा
श्री प्रदीप शर्मा
कुछ व्यक्तित्व मलाई जैसे होते हैं, मसलन दलाई लामा ! मैं छुटपन से देखता आ रहा हूँ। मैंने मलाई के स्वाद में और दलाई लामा के स्वरूप व स्वभाव में कभी कोई अंतर नहीं पाया।
मलाई दूध का वाष्पीकृत, परिष्कृत स्वरूप है। दलाई लामा भी व्यक्ति, संस्कार, साधना, संयम और सहनशक्ति की पराकाष्ठा है। हमारे शंकराचार्य की तरह दलाई लामा अपने नाम के आगे पीठ और नाम नहीं लगाते। वे अपने व्यक्तित्व को भी एक ही पदवी में, अवस्था में विलीन कर लेते हैं।।
आम इंसान एक साधारण दूध है, जिसे तपाने पर कुछ गाढ़ापन आने लगता है। संघर्ष और तपिश को बर्दाश्त करने की एक सीमा होती है। अगर तपन की आँच को कम न किया जाए तो व्यक्तित्व में क्रोध का उफान आने की संभावना रहती है, दूध या तो उफन जाता है, या जल जाता है। धैर्य और सहनशक्ति व्यक्ति में परिपक्वता और ठंडक लाता है।
यही दूध में मलाई है, इंसानों में विवेकवान, ज्ञानवान, लामाओं में दलाई लामा, और संतों में श्रेष्ठ महात्मा, शंकराचार्य अथवा सद्गुरु हैं।
हम कुछ सज्जनों को क्रीम ऑफ सोसयटी कहते हैं। जिस तरह खाद्य पदार्थों को क्रीम से गार्निश, अर्थात सजाया जाता है, यह आभिजात्य वर्ग देश के वैभव और सम्पदा को बढ़ाता है। देश की कीर्ति में चार चाँद लगाता है। ललित कला, साहित्य, संगीत और सामाजिक क्षेत्रों में विराजमान प्रतिभाओं को राष्ट्रीय सम्मानों से नवाज़ा जाता है।।
सामाजिक असमानता का आलम यह है कि किसी वंचित के नसीब में दूध की एक बूँद नहीं, और कहीं देखो तो मलाई-पाक से नीचे बात नहीं। जो सम्पन्न लोग मलाई का संग्रह कर लेते हैं, उन्हें कालांतर में मलाई से नवनीत और घृत की प्राप्ति होती है, जो शरीर को स्वस्थ व दीर्घायु रखता है। आम आदमी बची हुई छाछ से ही कढ़ी बना संतुष्ट हो जाता है और अपने प्रभु का गुणगान करता रहता है।
दलाई लामा बनना इतना आसान नहीं ! जप, तप, त्याग और संयम ही जीवन की मलाई है, निचोड़ है। सियासती नारे और चुनावी वादे भी एक तरह मलाई का ही प्रलोभन है। मेहनत की, पसीने की कमाई से आप सिर्फ़ दूध की ही आस रख सकते हैं, और कभी दूध से भी जल जाएँ, तो छाछ भी फूँक-फूँककर पी सकते हैं।।
आजकल तो मलाई का भी आरक्षण होने लग गया है। बिल्ली की तरह इंसानों में भी एक प्रजाति होती है, जिसे वीआईपी कहते हैं। जिस प्रकार सात तालों में रखी मलाई पर बिल्ली हाथ साफ़ कर सकती है, मलाई का उत्तम-भोग भी सबसे पहले वीआईपी द्वारा ही लगाया जाता है। हम तो खुरचन से ही संतुष्ट होने वाले लोग हैं …!!!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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