श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६४ ☆

☆ आलेख ☆ ~ बलिया बलिदान दिवस – १९ अगस्त ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(क्रांतिकारियों की कहानी – श्रेयस की जुबानी)

१९ अगस्त बलिया बलिदान दिवस है। यानी १९ अगस्त १९४२ को जब पूरे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का शासन था, यूँ कहे अपना बृहद भारत अंग्रेजी दासता के अधीन गुलाम था।

मैं कहानी कह रहा हूँ उस वक्त की, कि जब पूरे देश में क्रांति की ज्वाला जल उठी थी।

बलिया का अपना एक अलग इतिहास रहा है। पौराणिक काल से लेकर आज तक इस जनपद ने समय-समय पर कुछ नया कर दिखाया है। तभी तो हमारे जिले में आज भी युवाओं के मुंह से एक आवाज निकल जाती है।

“सब जिला जिला ह, हमार जिला बलिया ह”..

और इसके बाद एक नारा लगता है..”बोल बोल भृगु बाबा की जय”

आखिर सब जिला, जिला ह, त बलिया हमार जिला खास काहे ह..

इसका उत्तर मुझे जो समझ में आया वह यह कि-

जैसा कि पुराणो में विदित है कि बलिया भक्त प्रहलाद के पौत्र असुरराज बली की राजधानी हुआ करती थी। वही राजा बलि जिनके १०८ यज्ञॉ के प्रभाव ने देवराज इंद्र के भी सिंहासन को हिला कर रख दिया था, जिसके कारण भगवान विष्णु को वामन स्वरूप में दानवीर बलि के यहाँ याचक के रूप में आना पड़ा था। चूँकि राजा बलि ने १०८ यज्ञ किए थे, जिसके चलते बलिया का नाम बलियाग फिर कालांतर में बलिया पड़ा। महर्षि भृगु और भगवान विष्णु की कहानी को तो हम सभी जानते हैं,। उसके बाद १९५७ में पंडित मंगल पाण्डेय का बाकी तेवर ने मेरठ छावनी में बगावत करते हुए अंग्रेज ऑफिसर को गोली मार दिया। बाद में उन्हें फांसी हुई और आजादी का यह ऐतिहासिक बलिदान बलिया के खाते में जुड़ गया, फिर आता है वर्ष १९४२,.. वर्ष १९४२ में बलिया आज ही के दिन 19 अगस्त को बलिया चार दिनों के लिए आजाद हो गया था। फिर आया इमरजेंसी कॉल जब बलिया के लोकनायक जयप्रकाश नारायण का बिगुल बजा था और तरुणाई जग गई। इसके बाद समय-समय पर कोई न कोई ऐसे महापुरुष हुए, और उन्होंने कुछ ऐसा किया कि उनका नाम इतिहास में जुड़ गया जैसे हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री चंद्रशेखर जी जैसे महापुरुषों को इस धरती ने जन्मा, जिन्होंने बलिया को अपनी अलग पहचान दी। यह पहचान का सिलसिला अभी भी खत्म नहीं हुआ है।

आज १९ अगस्त है, अब भी अगस्त का महीना अपनी पहचान पर कायम। बलिया नित नवीन इतिहास और नवभारत का इतिहास लिख रहा। हम ऐसे महापुरुषों को हम नमन करते हैं।

बलिया में क्रांति का बिगुल कैसे बजा? इसके सार संक्षेप में कहते हुए यदि हम आगे बढ़ते हैं तो कहानी कुछ यूँ बनती है-

९ अगस्त को रेडियो की खबरों के द्वारा पता चला कि महात्मा गांधी,जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेताओं की गिरफ्तारी हो चुकी है, और पूरे देश में जरूर क्रांति की शुरुआत हो गयी थी। इसमे बलिया पीछे नही था लेकिन बलिया की क्रांति कुछ हटकर हुई, क्योंकि… बात तो वही है कि –सब जिला जिला ह..

इस कहानी को बताने पहले मैं एक ऐसे एक दो जीवित क्रांतिकारी के मुंह से सुनी हुई कहानी से इसका प्रारंभ करना चाहता हूँ जिनके साथ मुझे कुछ वक्त बिताने का अवसर मिला और उनके मुंह से कही हुई बात, उनके पौत्र श्री रजनीश सिंह जी की जुबानी है इसे आपके बीच में रख रहा हूँ, यह हम सभी की जानकारी हेतु जरूर विशेष होगी।

मैं बात कर रहा हूं जनपद बलिया के तहसील बांसडीह के अंतर्गत आने वाले गांव कैथवली के बाबू रामदयाल सिंह की जुबानी। मैं उनके नजदीक इसलिए भी हूं कि उनकी नतिनी (बेटी की बेटी) की शादी मुझसे हुई थी। और जब कभी हम लोग एक पास बैठते थे वे अक्सर वे अपनी पुरानी यादों को साझा किया करते थे.

उस वक्त चंद परिवारों को छोड़कर अन्य सामान्य परिवार आर्थिक तंगी में रहता ही था। कुछ खेती बारी होने के बावजूद भी लोगों को अपनी आर्थिक जरूर पूरा करने के लिए बाहर जाना होता था। विशेष रूप से बलिया की यह विशेषता ही रही। गंगा,सरयू (घाघरा) और तमसा (टोंस) जैसी नदियों से घिरे हुए इस जनपद, के लोग बाढ़ की विभीषिका झेलते हुए बार-बार बेघर हो जाया करते थे। हर बार जब घर लौट कर आते तो एक छप्पर डालते, एक छोटा सा नव सृजित फूस के घरों से बने का गाँव को बनाते तो कोई दुबे छपरा, दल छपरा, गोहिया छपरा बन जाता है। मैं प्रवास की बात इसलिए कर रहा हूँ कि यह प्रवास जहां एक तरफ यहाँ के लोगों के लिए अभिशाप होता था तो वहीं, यहां के लिए लोगों के लिए शैक्षिक,आर्थिक,सामाजिक उन्नति का कारण बनता रहा है। यह प्रवास सिर्फ भारत तक नहीं रहा बल्कि भारत के बाहर सुदूर मॉरीशस सहित अन्य करेबियन देशों तक पहुंचता है और वहाँ स्वयं को स्थापित करता था। मॉरीशस की कहानी मैंने अपने साहित्यिक गुरु श्री रामदेव धुरंधर से बार-बार सुनी है। उनके पूर्वज भी वर्ष 1838 में बलिया से ही मॉरीशस गए थे।

स्व.राम दयाल सिंह जी भी मिडिल पास करने के बाद आर्थिक तंगी और पारिवारिक परेशानियों को लेकर कोलकाता नौकरी पर चले गए, अपने मातृभूमि से कई सो किलोमीटर दूर वे कलकत्ता अवश्य गए लेकिन उनके दिल से, उनके मन में मातृभूमि की यादें बनी रहतीं। ६ या ७ वर्ष नौकरी करने के बाद वे बनारस लौट आए, और वहां कहीं किसी सेठ साहूकार के रहकर मुंशी गिरी का काम करने लगे। वाराणसी में गांधी जी की सभा हुई और उन्होंने क्रांतिकारियों के भाषण को सुना उनके मन में क्रांति की आग जल गई और फिर क्या था, बनारस में उन्होंने सेठ की नौकरी को लात मारा और बलिया चले आए। बलिया आकर क्रांतिकारियों के आंदोलन में जमकर जुड़ गए।

श्री राम दयाल सिंह जी (नाना जी)बताते हैं कि उस जमाने में संचार के कोई साधन नहीं हुआ करते थे। पूरे देश में क्या हो रहा है इसकी जानकारी उन्हें मात्र रेडियो,वह भी किसी खास बीबीसी न्यूज़ से पता चलती थी। अब युवाओं में जोश कैसे जगे। हर रोज की जानकारी कैसे मिले युवा रामदायल सिंह उस समय एक रेडियो लेकर आते थे और अपने गाँव कैथोलिक में एक जगह बड़की दलान हुआ करती थी, वही बैठकर रेडियो खोलने और स सारे लोग समाचार सुनते थे और उन्हें पता चलता था कि पूरे देश में क्रांति और आजादी की लड़ाई किस ढंग से लड़ी जा रही है और क्या-क्या घटनाएं घट रही है.

इन लोगों के लिए यह सिर्फ एक समाचार नहीं था, यह तो एक जलती हुई चिंगारी थी जो हर वक्त उनके भीतर जल रही थी आखिरकार यह चिंगारी शोले के शक्ल में बदल गई –

अब आगे बढ़ते हुए मैं बलिया के अंदर 1942 कि उसे क्रांति की तिथि वार घटना का वर्णन संछिप्त कर रहा हूं। इसका संदर्भ मैंने बलिया के इतिहास विद श्री शिव कुमार कौशिकेय जी की पुस्तक बलिया विरासत से लिया है –

9 अगस्त को बलिया में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल आज की गिरफ्तारी की खबर मिलने के बाद स्थानीय स्तर पर तत्कालीन नगर मंत्री श्री उमाशंकर सोनार अपने साथी सरजू प्रसाद के साथ मिलकर 10 अगस्त को बलिया में जुलूस निकाले और सभी छात्रों और व्यापारियों ने उसमें भाग लिया।

11 अगस्त को इस जुलूस के बाद एक भाषण शहीद पार्क पर हुआ। इस भाषण के दौरान पंडित राम अनंत पांडे जी को गिरफ्तार कर लिया गया। आंदोलन की चिंगारी शहर से गांवों की तरफ बढ़ गई। 12 अगस्त को बलिया और बैरिया में विशाल जुलूस निकाला गया। पुलिस और छात्रों के बीच का मार पीट और झड़प हुई। 30 छात्रों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया 13 अगस्त को बनारस से बलिया पहुंची ट्रेन को छात्रों ने चित्त बड़ा गांव रेलवे स्टेशन पर फूंक दिया और रेल की पटरी को उखाड़ कर प्रदर्शन किया . खेजूरी बेल्थरा रोड में जनसभाएं हुई 14 अगस्त को चितबड़ागांव ताजपुर में रेल की पटरिया उखाड़ दी गई। बेल्थरा रोड में भी आंदोलन तीव्र हो गया वहां पर भी यही सारी चीजे हुई। सिकंदरपुर में मिडिल स्कूल में जुलूस निकाला गया वहां क्या स्थानीय थानेदार ने क्रूरता दिखाते हुए बच्चों पर घोडों को दौड़ा दिया। सैकड़ो छात्र घायल हुए 15 अगस्त को बलिया जनपद के जहाज घाट, माल गोदाम डाकघर आदि पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने लूट पाट करना शुरु किया। चितबड़ागांव में तमसा नदी पर लकड़ी के बने पिपरा घाट पुल को तोड़कर सेनानियों ने सारे रास्ते बंद कर दिए। जहां-जहां क्रांतिकारी आंदोलन करते धीरे-धीरे वहां वह एक सरकारी कार्यालय पर कब्जा करते और अपना शासन चलाने लगे। पंचायत की राज शासन व्यवस्था काम करने लगी बैरिया,नगरा ताखा आदि कई जगहों पर भी क्रांतिकारियों ने ऐसे ही कार्रवाई की। 16 अगस्त को जिला मुख्यालय पर अपनी हनक जमाने के लिए जिला प्रशासन ने धारा 144 का कड़ाई से पालन करने का आदेश दिया लेकिन सेनानियों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। इसका प्रतिरोध खोरी पाकर गांव के युवा दुखी कोइरी ने किया। पुलिस फायरिंग में दुखी कोईरी समेत 7 लोग शहीद हो गए। चिलकहर रेलवे स्टेशन फूंक दिया गया, नौरंगा घाट पर खड़े माल भाग जहाज को बहा दिया गया। 17 अगस्त 1942 को हुए ऐतिहासिक स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान पर क्रांतिकारियों ने रसड़ा तहसील को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराया था। इस संघर्ष में चार वीर सपूत अमर हो गए थे। तहसील और थाने पर सेनानियों ने बहुत आसानी से अधिकार जमा लिया। इसी दिन बांसडीह तहसील पर बगैर किसी प्रतिरोध के स्वराज सरकार का अधिकार हो गया। 18 अगस्त 1942 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और ब्रितानी पुलिस के बीच चूहा बिल्ली का खेल चल रहा था। वह खूनी संघर्ष में बदल गया बैरिया थाने पर तिरंगा फहराने और स्वराज सरकार के अधिकार को लेकर हुई जंग में 18 सेनानी शहीद हो गए।

अब आया 19 अगस्त 1942 का वह दिन जब बलिया के क्रांतिकारियों ने इतिहास रच दिया। ब्रिटानी दास्ताँ का दंश झेल रहे लोगों के लिए एक नजीर बनी लाखों की साथ-साथ भीड़ में जिला मुख्यालय को घेर लिया। मजबूर होकर ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन कलेक्टर जगदीश चंद्र निगम एवं पुलिस कप्तान जियाउद्दीन अहमद ने आत्मसमर्पण कर दिया। जेल में बंद कांग्रेस के तात्कालिक जिला अध्यक्ष पंडित चित्तू पांडे, महानंदा मिश्रा, विश्वनाथ चौबे आदि सभी राजनीतिक कैदियों को जेल से जेल का फाटक खोलकर रिहा कर दिया गया और बलिया आजाद हो गया।

मैं बात श्री राम दयाल सिंह जी की कर रहा था, बॉसडीह कचहरी पर कब्जे के दौरान आंदोलन का कर रहे रामदयाल सिंह और अन्य लोगों को आखिरकार गिरफ्तारी से बचने के लिए फरारी का रास्ता चुना पड़ा लेकिन यह बहुत ज्यादा दिन नहीं रही। श्री रामदयालु सिंह गिरफ्तार करके बनारस जेल भेज दिए गए .

श्री राम दयाल सिंह जी बताते हैं कि जेल में उन लोगों को जी बैरक में रखा गया था। पांच सोटा की सजा सुनाई गई। यानी प्रतिदिन इन क्रांतिकारियों को डंडे से पीटा जाता था, जिसे वे लोग हंसते-हंसते बर्दाश्त करते थे। स्वर्गीय श्री राम दयाल सिंह जी एक और बात बताते थे उसे समय उसे जेल में केवल एक अखबार आता था। वह सब लोग पढ़े लिखे नहीं थे क्योंकि वह पढ़े लिखे थे तो और जेल के साथी कैदी उनसे कहते थे कि ए रामदयाल के खबर पढ कर के सुनाओ। बाबू राम दयाल सिंह उसे पढ़ कर अपने कैदी साथियों को सुनाते थे इस तरह से उनके मुंह से कही हुई बातों को भी मैं यहां रखा।

देश आजाद हो गया,ये क्रांतिकारी रिहा हुए इनको तात्कालिक मुख्यमंत्री श्री गोविंद बल्लभ पंत जी ने तराई में जंगलों के बीच कुछ जमीन इनके लिए जमीने आवंटित की और यह वर्तमान में इनका परिवार उधम सिंह जनपद के आनंदपुर नमक के गांव में रहता है

दूसरे बड़े क्रांतिकारी जो बलिया की आजादी की लड़ाई में बड़ा नेतृत्व कर रहे थे उनकी चर्चा भी करना चाहूंगा क्योंकि उनके साथ तो मैं अपने बचपन के बहुत समय बिताए हैं। मेरे गाँव को संवरा नहीं, बोलते हैं संवरा को,संवरा -गोपालपुर बोलते हैं। गोपालपुर और संवरा दोनों जुड़वा नाम के रूप में एक साथ लिया जाता था। इसी गोपालपुर में जन्मे हुए क्रांतिकारी पंडित विश्वनाथ चतुर्वेदी जी, श्री चित्तू पाण्डेय के साथ उस आंदोलन के हिस्सा थे। जिसका वर्णन मैंने पहले भी किया था। आजादी की लड़ाई से जुड़ी हुई बहुत सारी घटनाओं की जानकारी बहुत सारी बातें वे हमसे बताते थे। अत्यंत सरल और सहज प्रकृति के लेकिन अनैतिकता के घोर विरोधी विश्वनाथ चतुर्वेदी जी हमारे सबसे नजदीक के क्रांतिकारियों में से एक थे। पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर जी उनको बहुत आदर करते थे। जिसे मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है। चंद्रशेखर जी जब हमारे गांव संवरा चट्टी पर आते थे तो वह चट्टी नहीं कहते थे,चौराहा कहते थे। यहां पहुंचते हुए बोलते थे कि चौबे जी (श्री विश्वनाथ चतुर्वेदी) को बुलाओ।

यह बात मेरे बचपन की है। मै एक और क्रांतिकारी की बात करके मैं अपनी बात को समाप्त करूंगा। वह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जो गुमनाम क्रांतिकारी थे। उनकी कहानी को मैं अपने पुस्तक काव्य कथा विथिका के द्वितीय खंड में स्थान दिया है। हमारे गांव के सिंहा मिसिर जो कि कभी जेल नहीं गए नहीं वह क्रांतिकारी घोषित किए गए उनके न पत्नी थी नाही उनके बच्चे थे। वे पूरे जीवन ऐसे ही रह गए वह हमसे कहा करते थे।

बाबू.. हमनी के रेल लाइन के काटी जा और आंदोलन करी जा, लेकिन पुलिस के डर से हम भाग जाईजा।

क्योंकि उनकी गिरफ्तारी नही हुई, उनका नाम डर से भाग जाने वाले क्रांतिकारियों के लिस्ट में था। सबको पेंशन मिलता रहा लेकिन स्व. सिघा मिसिर जी आज वह हमारे बीच में नहीं है लेकिन जब हम 19 अगस्त बलिया बलिदान दिवस में क्रांतिकारियों को याद कर रहे हैं तो मैं उन्हें भी याद करता हूँ ऐसे गुमनाम अनेकों क्रांतिवीरों को भी याद करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।

जय हिंद, जय बलिया।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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