डॉ. मुक्ता
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख महाभारत नहीं रामायण। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण लेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – इंसाप्नरभु मिलन की आस / योगाश्रम प्रस्तुति , सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३३९ ☆
☆ महाभारत नहीं रामायण… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘जब तक सहने की चरम सीमा रहेगी, रामायण लिखी जाएगी। मांगा हक़, जो अपने हित में महाभारत हो जाएगी।’ जी हाँ! यही सत्य है जीवन का, जो सदियों से धरोहर के रूप में सुरक्षित है। इसलिए नारी को सहन करने की शिक्षा दी जाती है, क्योंकि मौन सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम निधि है। वैसे तो यह सबके लिए वरदान है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने मौन रहकर व चित्त को एकाग्र कर अपने अभीष्ठ को प्राप्त किया है और जीव-जगत् व आत्मा-परमात्मा के रहस्य को जाना है। जब तक आप में सहन करने की शक्ति व त्याग करने का सामर्थ्य है; परिवारजन व संसार के लोग आपको सहन करते हैं, अन्यथा जीवन से बेदखल करने में पल-भर भी नहीं लगाते। विशेष रूप से नारी को तो बचपन से यह शिक्षा दी जाती है, ‘तुम्हें सहना है, कहना नहीं’ और वह धीरे-धीरे उसे जीने का मूलमंत्र बना लेती है तथा पिता, पति व पुत्र के आश्रय में सदैव मौन रहकर अपना जीवन बसर करती है।
वास्तव में नारी धरा की भांति क्षमाशील व सहनशील है; गंगा की भांति निर्मल व निरंतर गतिशील है; पापियों के पाप धोती है; पर्वत की भांति अटल है, परंतु कभी उफ़् नहीं करती। इसी प्रकार नारी भी ता-उम्र सबके व्यंग्य-बाणों के असंख्य भीषण प्रहार व ज़ुल्म हंसते-हंसते सहन करती है… यहां तक कि वह कभी भी अपना पक्ष रखने का साहस नहीं जुटा पाती। वैसे तो पुरुष वर्ग द्वारा यह अधिकार नारी-प्रदत्त हैं ही नहीं। सो! वह दोयम दर्जे की प्राणी समझी जाती है– एक हाड़-मांस की जीवित प्रतिमा, जिसे दु:ख-दर्द होता ही नहीं, क्योंकि उसका मान-सम्मान नहीं होता। इसलिए आजीवन कठपुतली की भांति दूसरों के इशारों पर नाचना उसकी नियति बन जाती है। वह आजीवन समस्त दायित्व-वहन करती है; उसी आबोहवा में स्वयं को ढाल लेती है; दिन-भर घर को सजाती-संवारती व व्यवस्थित करती है और वह उस अहाते में स्वयं को सुरक्षित अनुभव करती है। बच्चों को जन्म देकर ब्रह्मा व उनकी परवरिश कर विष्णु का दायित्व निभाती है और उसके एवज़ में उसे उस घर में रहने का अधिकार प्राप्त होता है; जिसे वह कभी अपना कह ही नहीं सकती। यदि वह संतान को जन्म देने में असमर्थ रहती है, तो बाँझ कहलाती है और उससे उस घर में रहने का अधिकार भी छीन लिया जाता है, क्योंकि वह वंश-वृद्धि नहीं कर पाती। परिणाम-स्वरूप पति के पुनः विवाह की तैयारियां प्रारंभ की जाती हैं। इस स्थिति में साक्षर-निरक्षर का भेद नहीं किया जाता है… भले ही वह अपने पति से अधिक धन कमा रही हो; अपने सभी दायित्वों को सहर्ष वहन कर रही हो। मुझे स्मरण हो रही है ऐसी ही एक घटना…जहां एक शिक्षित नौकरीशुदा महिला को केवल बाँझ कह कर ही तिरस्कृत नहीं किया गया; उसे पति के विवाह में जाने को भी विवश कर लिया गया, ताकि उसकी मांग में सिंदूर व गले में मंगलसूत्र धारण करने का अधिकार कायम रह सके और उसे विवाहिता के रूप में उस छत के नीचे रहने का अधिकार प्राप्त हो सके। परंतु एक अंतराल के पश्चात् घर में बच्चों की किलकारियां गूंजने के पश्चात् घर- आँगन महक उठा और वह खुशी से अपना पूरा वेतन घर में खर्च करती रही। धीरे-धीरे उसकी उपस्थिति नव-ब्याहता को अखरने लगी और वह उस घर छोड़ने को विवश हो गयी। परंतु फिर भी वह मांग में सिंदूर धारण कर पतिव्रता नारी होने का स्वांग रचती रही। है न यह उसके प्रति अन्याय…. परंतु उस पीड़िता को सब मूर्ख समझते हैं, जिसने घर फूंक कर तमाशा देखा है। इसलिए उसके पक्ष में कोई भी आवाज़ नहीं उठाता।
सो! जब तक सहनशक्ति है, आपकी प्रशंसा होगी और रामायण लिखी जाएगी। परंतु जब आपने अपने हित में हक़ मांग लिया, तो महाभारत होना निश्चित है। वैसे भी अधिकारों की मांग करना–संघर्ष का आह्वान करना है और संघर्ष से महाभारत हो जाता है और जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं रहता। राजनीति हो या धर्म; घर-परिवार हो या समाज; हर जगह इसका दबदबा कायम है। राजनीति तो सबसे बड़ा अखाड़ा है, परंतु आजकल तो सबसे अधिक झगड़े धर्म के नाम पर होते हैं।
घर-परिवार में भी अब इसका पूर्ण हस्तक्षेप है। पिता-पुत्र, भाई-भाई व पति-पत्नी के जीवन से स्नेह-सौहार्द इस प्रकार नदारद है, जैसे चील के घोंसले से माँस। जहां तक पति-पत्नी का संबंध है, उनमें समन्वय व सामंजस्य है ही नहीं… वे दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपना क़िरदार निभाते हैं, जिसका मूल कारण है अहं; जो मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसी कारण वे आजकल एक-दूसरे के अस्तित्व को भी नहीं स्वीकारते; जिसका परिणाम अलगाव व तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष है। वैसे भी आजकल संयुक्त परिवार-व्यवस्था का स्थान एकल परिवार- व्यवस्था ने ले लिया है, परंतु फिर भी पति-पत्नी आपस में प्रसन्नता से अपना जीवन बसर नहीं कर पाते और एक-दूसरे से निज़ात पाने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। वैसे भी आजकल ‘तू नहीं, और सही’ का बोलबाला है। लोग संबंधों को वस्त्रों की भांति बदलने लगे हैं, जिसका मूल कारण ‘लिव-इन व प्रेम विवाह’ है। अक्सर बच्चे भावावेश में संबंध तो स्थापित कर लेते हैं और चंद दिन साथ रहने के पश्चात् एक-दूसरे की कमियाँ-ख़ामियाँ उजागर होने लगती हैं; जिन्हें वे स्वीकार नहीं पाते और परिणाम होता है तलाक़–जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ता है। वैसे आजकल सिंगल पेरेंट का प्रचलन भी बहुत बढ़ गया है। सो! इन विषम परिस्थितियों में बच्चों का सर्वांगीण विकास कैसे संभव है? एकांत की त्रासदी झेलते बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। वे असामान्य हो जाते हैं; सहज नहीं रह पाते और वह सब दोहराते हुए अपना जीवन नरक-तुल्य बना लेते हैं।
ग़लत लोगों से अच्छी बातों की अपेक्षा कर हम आधे ग़मों को प्राप्त करते हैं और आधी मुसीबतें हम अच्छे लोगों में दोष ढूंढ कर प्राप्त करते हैं। ग़लत साथी का चुनाव करके हम अपने जीवन के सुख-चैन को दाँव पर लगा देते हैं और दोष-दर्शन हमारा स्वभाव बन जाता है, जिसके परिणाम- स्वरूप हमारा जीवन जहन्नुम बन जाता है। आजकल लोग भाग्य व नियति पर कहाँ विश्वास करते हैं? वे तो स्वयं को भाग्य-विधाता समझते हैं और यही सोचते हैं कि उनसे अधिक बुद्धिमान संसार में कोई दूसरा है ही नहीं। इस प्रकार वे अहंनिष्ठ प्राणी पूरे परिवार की जीवन भर की खुशियों को लील जाते हैं। संदेह व अविश्वास इसके मूल कारक होते हैं। सो! समाज में शांति कैसे व्याप्त रह सकती है? इसलिए बीते हुए कल को याद करके उससे प्राप्त सबक़ को स्मरण रखना श्रेयस्कर है। मानव को अतीत का स्मरण कर अपने वर्तमान को दु:खमय नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उससे सीख लेकर अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहिए। जीवन में सफलता पाने का मूलमंत्र यह है कि ‘उस लम्हे को बुरा मत कहो, जो आपको ठोकर पहुँचाता है; बल्कि उस लम्हे की कद्र करो, क्योंकि वह आपको जीने का अंदाज़ सिखाता है। दूसरे शब्दों में अपनी हर ग़लती से सीख गहण करें, क्योंकि आपदाएं आपके धैर्य की परीक्षा लेती हैं और मज़बूत बनाती हैं। सो! ग़लती को दोहराओ मत। जो मिला है, उन परिस्थितियों को उत्तम बनाने की चेष्टा करो; न कि भाग्य को कोसने की। हर रात के पश्चात् सूर्योदय अवश्य होता है और अमावस के पश्चात् पूनम का आगमन भी निश्चित है। जीवन में आशा का दामन कभी मत छोड़ें, क्योंकि गया वक्त लौटकर कभी नहीं आता। हर पल को सुंदर बनाने का प्रयास करें। जीवन में सहन करना व त्याग करना सीखें, क्योंकि अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस का त्याग करना पड़ता है। संचय की प्रवृत्ति का त्याग करें। इंसान खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ ही इस संसार से लौट जाना है। सो! सदाशयता को अपनाएं और दूसरों के प्रति कर्तव्यनिष्ठता का भाव रखें, क्योंकि कर्त्तव्य व अधिकार अन्योन्याश्रित हैं। अधिकार-स्थापत्य अशांति- प्रदाता है, जो हृदय का सुक़ून छीन लेता है। इसलिए उसे अपने जीवन से बाहर का रास्ता दिखा दें, ताकि हर घर में रामायण की रचना हो सके। पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष व संघर्ष को जीवन में पदार्पण मत करने दें, क्योंकि ये महाभारत के जनक हैं, प्रणेता हैं। सो! अलौकिक आनंद से अपना जीवन बसर कर लें।
●●●●
© डा. मुक्ता
माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी
24.8.22
संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




