श्री अनिल वामोरकर
☆ कविता ☆
☆ जादू ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆
मैं क्या जानूँ
क्या जादू है?
जिस दिन हुए दर्शन
मैं मैं न रहा…
तपोवन में जाता
सुध बुध खो जाता
क्या जानूँ क्या बात है
मैं मैं न रहा…
वाणी की मिठास
बोधप्रद ज्ञान
अमावस की रात
फिर भी अंतर मे प्रकाश
मैं मैं न रहा…
न जगत की खबर
न घर की याद
शाश्वत आनंद की बौछार
मैं मैं न रहा…
माँ की नज़र
करुणा का सागर
वात्सल्य की मूरत
बदल गया अंदर बाहर से
मैं मैं न रहा…
जब मैं छूटा
हलका सा महसूस होता,
शाश्वत आनंद का झोका
ऊपर ही ऊपर
चला चला
मैं मैं न रहा…
© श्री अनिल वामोरकर
अमरावती
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





