श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मुखौटा !)
☆ लघुकथा # १३३ – मुखौटा ! ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
“हर साल रावण जलता है, फिर भी उसका कारोबार फल-फूल रहा है!” मोहन ने मैदान की ओर देखते हुए कहा।
सोहन हँसा, “माँग है, तभी तो आपूर्ति है!”
“बिल्कुल! कोई रिश्वत से जेब भर रहा है, कोई पद की आड़ में तिजोरी। पुतला बेचारे की बदनामी मुफ्त में हो रही है।”
सोहन ने चुटकी ली, “तो क्या दशहरा मनाना छोड़ दें?”
“क्यों? फोटो खिंचवाने, तालियाँ बटोरने और भाषण देने का इतना बढ़िया अवसर जो है!”
“तुम्हें तो हर आयोजन में खोट नजर आता है!”
“खोट नहीं, खाता नजर आता है। अच्छाई का हिसाब भाषणों में चुकता, लोभ का बहीखाता व्यवहार में चालू!”
सोहन ठहाका मारकर बोला, “फिर तो रावण अमर है!”
मोहन ने मुस्कराकर कहा, “जब तक दूसरों की बुराई गिनकर अपनी करतूतों पर पर्दा डालते रहेंगे, उसे मरने की जरूरत ही क्या है?”
तभी रावण के पुतले में आग लगी। भीड़ तालियाँ बजाने लगी।
सोहन ने प्रसन्न होकर कहा, “देखो, बुराई का अंत हो गया!”
मोहन ने उसकी ओर देखा, “हाँ, अब कल से फिर वही ईमानदारी की बातें और बेईमानी के काम।”
इस बार सोहन के होंठ खुले, मगर हँसी बाहर नहीं आई।
उसने कहा चलो दोस्त हम दोनों एक-एक मुखौटा खरीद के लगा लेते हैं सबने राम का लगाया हम रावण का खरीदे।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




